Saturday, 3 August 2013

असत्य से सत्य की ओर

ॐ असतो मा सद्गमय,
 तमसो मा ज्योतिर्गमय, 
मृत्योर्मा अमृतं गमय।

 हम असत्य से सत्य की ओर जाएं, अंधकार से प्रकाश की ओर जाएं, मृत्यु से अमरता की ओर जाएं। हम असत्य में हैं, अतः हमें सत्य चाहिए, हम अज्ञान-अंधकार में है अतः हमें ज्ञान की रश्मि चाहिए, हम मृत्यु के भय में डुबे हूए हैं अतः हमें अमरता चाहिए। कैसे मिले हमें यह सत्य ? कैसे हमारे जीवन में ज्ञान का आलोक फैले ? कैसे हम मृत्यु के भय से मुक्त हों ? यही है वे प्रश्न, जिनका उत्तर अपनी शैली एवं भाष में आपके समक्ष रखने की चेष्टा कर रहा हूं।
लोग आते हैं और कहते हैं-में इस दुनिया से ऊब चुका हूं। इस जीवन से थक चुका हूं। यह संसार मुझे अच्छा नहीं लगता। कोई नई दुनिया चाहिए, नई सृष्टि चाहिए। वे कहते हैं इस दुनिया में रोग है, बुढ़ापा है, मौत है, दुःख है। इस दुनिया में क्रोध है घृणा है, ईर्ष्या है, आदमी आदमी को मारना चाहता है, आदमी-आदमी को दुत्कारता है, अपमान करता है। यह दुनिया पागलों की दुनियां जैसी लगती है। मुझे ऐसी दुनिया चाहिए जहां ये सारे दोष न हों, जहां आदमी-आदमी के प्रति विश्वस्त हो, आदमी-आदमी से प्यार करता हो। में सोचता हूं इस स्थिति से आप सब सहमत हैं। आपके मन में भी यह कल्पना जागती है कि ऐसी दुनिया में जीने का क्या अर्थ है ? ऐसा सोचना एवं महसूस करना दोनों सही है। कभी भृर्तहरि ने भी यही कहा था-
भोगे रोग भयं, कुले च्युति भयं,
वित्ते नृपालाद भयं।
शास्त्रे वादि भयं, गुणे खल भयं,
काये कृतान्ताद् भयं।।
माने दैन्य भयं, बले रिपु भयं,
रूपे जराया भयं,
सर्वे वस्तु भयान्वित भुवि नृणां,
वैराग्य मेंवाभयम्।।

इन प्रश्नों का उत्तर सिर्फ हमारी द्र्ष्टी मे है तुम्हें जैसी सृष्टि चाहिए, वैसी दृष्टि तुम्हारी आंखो के सामने प्रतिपल नाच रही है। दोष बेचारी सृष्टि का नहीं, दोष तुम्हारी दृष्टि का है। दोष तुम्हारा अपना है। उस सृष्टि को देखने वाली आंखें चाहिए। यदि यह आंख तुम्हे उपलब्ध हो जाएं, तो यह सुष्टि इतनी कुरूप नहीं है, यह सृष्टि धक-धक जलने वाली भट्टी नहीं है। प्रश्न किया गया- कौन सी आंख ? बाबाजी ने कहा- आराधना की आंख। दो आंखें होती है-एक है आराधना की आंख और दूसरी है-विराधना की आंख। यदि आराधना की आंख प्राप्त हो जाए तो हमारे सामने एक नए संसार का सृजन होता है। जहां वे सारे दोष नहीं है जिनका प्रहार आदमी को पग-पग पर सहन करना पड़ता है। जिज्ञासु ने पूछा-महाराज, आराधना किसकी ? महाराज ने फरमाया-मृत्यु दर्शन की, अमूर्त के दर्शन का अभ्यास, समर्पण की साधना एवं साधना की आराधना।
प्रकृति का रंगमेंच प्रतिपल परिवर्तित हो रहा है। एक पर्दा गिर रहा है दूसरा पर्दा उठ रहा है। एक क्षण भी ऐसा नहीं जाता जिसमें सारी सृष्टि का नया सर्जन न होता है। प्रतिक्षण एक सृष्टि मरती है, दूसरी सृष्टि पैदा होती है। नई सृष्टि दूर नहीं है। वह हमारे बहुत निकट है। इस परिवर्तनशील संसार में जवानी भी होगी, बुढ़ापा भी होगा, जीवन भी होगा, मृत्यु भी होगी। पर इन सबके बावजूद यदि दृष्टि बदल गई तो बीमारी का संताप होगा न अपमान का खेद होगा और न हानि की चिन्ता होगी। कहीं भय नहीं होगा। भय ही सब रोगों का मूल है। आराधना का अर्थ है भय का विसर्जन, भय का मन से निकल जाना।
भय का मूल कारण है परिस्थितियों के साथ मन की संयुति का होना। रोग से कष्ट नहीं होता। कष्ट होता है रोग के संवेदन से। रोगी तड़फता है चिल्लाता है पर एक मर्फिया का इंजेक्शन देते ही उसका सारा कष्ट मिट जाता है। उसका चिल्लाना, कराहना सब बन्द हो जाता है। क्या दर्द नष्ट हो गया ? नहीं, दर्द नष्ट नहीं हुआ है। दर्द जहां था वहीं है। कोई अन्तर नहीं आया। किन्तु मादक द्रव्य के प्रयोग से उसका संवेदन केन्द्र शून्य कर दिया गया। दर्द संवेदन से होता है। संवेदन केन्द्र निष्क्रिय होते ही कष्ट महसूस नहीं होता। जब मन संवेदन केन्द्र के साथ जुड़ता है तब तीव्र वेदना का अनुभव होता है और जब मन अन्य किसी में लगा होता है तो वेदना की अनुभूति नहीं होती। आराधना से मन का केन्द्र बदल जाता है। मन के दो केन्द्र हैं- एक है शरीर, दूसरा है चेतना। मन का चैतन्य केन्द्रित होना- नई सृष्टि का निर्माण है तथा मन का शरीर केन्द्रित होना यह हमारी दूसरी दुनिया है जिसमें हम जी रहे हैं। हम जिस नई सृष्टि की कल्पना करते हैं, वह चैतन्य केन्द्रित सृष्टि है जब दृष्टि बदल जाती है, मन का केन्द्र बदल जाता है तब सारी बातें बदल जाती है।
जब दृष्टि बदलती है तो सृष्टि सचमुच बदल जाती है। सुुकरात विष का प्याला पी रहा था। मित्रों ने पूछा-कैसा लग रहा है ? क्या सोच रहे हो ? सुकरात बोला- कुछ भी नहीं लग रहा है। पूछा गया- क्या मौत का भय नहीं है ? सुकरात ने कहा ’-मेंरे सामने दो दर्शन हैं, एक है आस्तिक दर्शन और दूसरा है नास्तिक दर्शन। नास्तिक कहते हैं आत्मा का अस्तित्व ही नहीं है। आत्मा ही नहीं है तो मौन का भय कैसा ? मर जाऊँगा तो मुझे भय ही क्या है ? आस्तिक कहते हैं आत्मा अमर है। में मर जाऊँगा तो किस बात का भय। आत्मा तो मरेगी नहीं फिर डर कैसा ? मुझे कोई भय नहीं है।
हम दुःखों से डरते हैं, पर कुन्ती प्रभु से मांगती ही दुःख है। मुझे दुःख चाहिए, मुझे आपत्ति चाहिए क्योंकि दुनिया के सभी सुख उन्माद पैदा करते हैं, अहंकार पैदा करते हैं। दुःख ही जीवन का सजग प्रहरी है। आपसे संयोग का, दुःख ही सेतु है। सुख-दुःख है। स्पंदनों के साथ यदि मन का योग नहीं होता है तो न सुख का अनुभव होता है। प्रिय स्पंदनों के साथ मन का योग होता है तो सुख का अनुभव होता है और अप्रिय स्पंदनों के साथ मन का योग होता है तो दुःख महसूस होता है। सुख-दुःख की जो कल्पना है वह मन के योग के साथ होती है। मन को न जोडे़। स्पंदन होते रहें कोई बात नहीं है। न सुख होगा और न दुःख।
दृष्टि परिवर्तन के लिए आराधना की परम आवश्यकता है। आराधना का पहला मुख्य सूत्र है- मृत्यु का दर्शन। जीवन की असफलता का कारण है- अहंकार और अहंकार विलय का सबसे बड़ा सूत्र है- मृत्यु का दर्शन। हम जीवन को बहुत जानते हैं मृत्यु को नहीं जानते । हम जीवन से बहुत प्यार करते हैं, मृत्यु से प्यार नहीं करते। मृत्यु से प्यार करने में घबराते हैं। जीवन और मृत्यु- ये दोनों एक साथ चलने वाली दो धाराएं हैं। जब से जीवन प्रारम्भ होता है तब से ही मृत्यु भी प्रारम्भ हो जाती है। जिस क्षण हमने जीना प्रारम्भ किया था उसी क्षण मरना भी प्रारम्भ हो गया था। यदि जीना शुरू हो और मरना शुरू न हो तो वह अमर हो जायेगा। फिर वह कभी नहीं मर सकता। जन्म के साथ मृत्यु आती है। निर्माण के साथ ध्वंस आता है। हम जन्म को देखते हैं। किन्तु जीवन के साथ-साथ सामानान्तर रेखा में चल रही मृत्यु को नहीं देखते।
मृत्यु हमारे जीवन का निषेधात्मक पक्ष है। यह बचाता है मनुष्य को। मौत नहीं होती तो अहंकार का साम्राज्य छा जाता। यही वह चोट है जिससे अहंकारी घबराता है। यहां सब कुछ नश्वर है सब कुछ चला जाने वाला है। यहां तन, धन, यौवन, सत्ता, यश, परिजन सब जाने वाले हैं। सिकन्दर महान का अन्तिम संदेश था कि जिस तरह में खालनी हाथ आया था, इतने सब करने के पश्चात भी आज खाली हाथ ही जा रहा हूं। उसी तरह ए दुनिया के लोगों तुम भी बंद मुट्ठी आए थे और खुले हाथ जाओगे फिर कैसा लगाव। यहां की सारी वस्तुएं यहीं रह जायेगी। और व्यक्ति तो अकेला ही जायेगा। अतः इस जगत की नश्वरता को समझो और किसी को दुःखी मत करो। किसी को अपने अधीन बनाने का प्रयास मत करो अपितु जगत को प्रेम से जीतने का यत्न करो।
जिन्होंने मृत्यु का दर्शन किया, उन्होंने अपनी शुद्धताओं का भी दर्शन कर लिया। जिन्होंने अपनी शुद्धताओं का दर्शन कर लिया, वह मृत्यु दर्शन के द्वार पर खड़ा हो गया। जिसने अपनी नौ क्षुद्रताओं का अनुभव कर लिया उसने मृत्यु का भी दर्शन कर लिया। क्षुद्रताओं में इस प्रकार हैः-

                 अपने साथियों एवं अपने से कमजोर व्यक्तियों पर रोब जमाने का प्रयत्न करना।
अपने कर्त्तव्य मार्ग को त्यागकर सस्ते एवं सुविधाजनक तरीके से पैसा कमाना।
 अपराध एवं अनुचित कार्य कर प्रायश्चित न करना।
मन की आवाज को आत्मा की आवाज समझना।
यश, कीर्ति एवं प्रतिष्ठा की संसार से अपेक्षा करना।
 प्रशंसा से प्रसन्न होना और निन्दा से दुःखी होना।
दूसरो के गुण-दोषों को देखना। स्वयं के साथ आंख मिचौनी।
 विपत्ति आने पर आत्म विश्वास खो देना।
 कृतज्ञता को भुला देना।
क्षुद्रता के अनुभव का मतलब है- स्वयं की आलोचना। दूसरों की अलोचना करना आसान है, अपनी आलोचना करना बड़ा कठिन है। अपनी आलोचना का अर्थ है- अपने आपको देखना। जब हम अपने आपके सामने खड़े होकर अपने दर्शन करेंगे तो जीवन भी दिखाई देगा, मृत्यु भी दिखाई देगी। फिर जीवन इतना प्रिय नहीं लगेगा तथा मृत्यु भी दिखाई देगी। फिर जीवन इतना प्रियं नही लगेगा तथा मृत्यु इतनी भयावनी नहीं लगेगी। यही वह स्थिति है जहां सत्य शोधकांे ने अपने प्राणों का मोह त्यागकर सत्य की रक्षा की। सूफी फकीर शम्सतबरेज की सत्य घोषणा अटल रही भले ही उसके प्राण ले लिए गए। उसकी घोषण थी-
’तुझ में खुदा, मुझे में खुदा,
इसमें खुदा उसमें खुदा
उसके अलावा और क्या ?
ऊपर खुदा नीचे खुदा
दाएं खुदा बाएं खुदा
उसके अलावा और क्या ?
ऐसी अभय की स्थिति मृत्यु-दर्शन से ही संभव है।
आराधना का दूसरा सुत्र है- अमूर्त के प्रति प्रियता। जब तक अमूर्त सौन्दर्य और रमणीयता के प्रति अनुराग नहीं जागता तब तक मूर्त सौन्दर्य और रमणीयता को त्यागा नहीं जा सकता। आदमी का सहज स्वाभाव है मधुरता के प्रति आसक्त होना। जब अधिक सौन्दर्य सामने आता है तब कम सौन्दर्य व्यर्थ बन जाता है। अधिक मीठी चीज सामने आती है तो कम मिठास वाली चीज अपने आप छूट जाती है। उसे छोड़ा नहीं जाता, वह छूट जाती है। छोड़ना कठिन होता है। छूटना कठिन नहीं होता। एक के प्रति अनुराग का अर्थ है दूसरे के प्रति विराग। एक के प्रति विराग का अर्थ है दूसरे के प्रति अनुराग। जिसका शब्द, रूप, रस, गंध एवं स्पर्श के प्रति अनुराग है उसका चैतन्य के प्रति विराग अपने आप हो जायेगा। जिसके मन में इन्द्रिय-विषयों के प्रति विराग हो जाता है। दोनों के प्रति अनुराग या विराग एक साथ नहीं हो सकता। दो दिशाओं में एक साथ नही जाया जा सकता।
मूर्त के प्रति होने वाली प्रियता को समाप्त करने का एक सूत्र है-अमूर्त के प्रति प्रियता को पैदा करना। शिव सुन्दरी अमूर्त है। अमूर्त के प्रति प्रियता उत्पन्न करना सरल नहीं ैे, कठिन है। पर अभ्यास एवं बारम्बार से ऐसा संभव है। जब अमूर्त के साथ मीरा का लय जुड़ गया, तब महाराजा के प्रति कोई लगाव नहीं रहा। मीरा पागल बन गई अमूर्त के प्रति। उसने मूर्त को त्याग दिया। जो सामने उपस्थित था उसके प्रति मन में कोई आकर्षण नहीं रहा।
आराधना का तीसरा सूत्र है- शरण समर्पण। शरण लेना बहुत कठिन बात है। प्रत्येक व्यक्ति सोचता है कि दूसरों को शरण दूं किन्तु वह दुसरों की शरण में जाना नहीं चाहता। दूसरों की शरण में जाना बहुत बड़ी बात है। जब तक अहंकार का विलय नहीं होता, कोई व्यक्ति किसी की शरण में नहीं जा सकता। जो व्यक्ति दूसरों की शरण में जाने के लिए तैयार हो जाता है उसका सारा व्यक्तित्व बदल जाता है। शेष कुछ नहीं बचता। अरब के बाजारों में गुलामों की बिक्री हो रही थी। बोलियां लग रही थी। महात्मा ने देखा लोग गुलामों को खरीद कर ले जा रहे हैं। महात्मा ने एक गुलाम से पूछा,
’तुम बिक गए ? हां, महाराज।
कहां जा रहे हो ? जहां मालिक ले जाएगा।
क्या काम करोगे ? जो मालिक कहेगा।
क्या खाओगा ? जो मालिक खिलायेगा। कहां रहोगे ? जहां मालिक रखेगा।
महात्मा ने सुना, अवाक् रह गए। आंखों से आंसू बह चले। उन्होंने कहा, ’एक गुलाम कितना समर्पित है अपने मालिक के प्रति। में अपने मालिक के प्रति इतना समर्पित नहीं हूँ। जो घटित होना था, वह हो गया। महात्मा अब प्रभु से अभिन्न हो गए थे।
समर्पण करना, शरण में जाना बहुत ही कठिन कार्य है। जो व्यक्ति अपने गुरू की या प्रभु की शरण में चला जाता है वह सारी चिंताओं से मुक्त हो जाता है। उसके लिए चिन्ता शेष नहीं रहती। चिन्ता करने वाला करे, वह निश्चिन्त हो जाता है। बच्चा मां के प्रति जब तक पूर्णतया समर्पित है वह पूर्ण रूपेण सुरक्षित है। वह पूर्णतया निश्चिन्त है। ज्यों ही समर्पण का भाव कम होता है, अहंकार का भाव जागता है। वही बच्चा असुरक्षा तथा नीरसता के आगोश में चला जाता है। पौराणिक इतिहास में हनुमान का चरित्र पूर्ण समर्पण का जीता जागता उदाहरण है। समर्णण की पराकाष्ठा है हनुमान के जीवन में। पर महानता की भी पराकाष्ठा है हनुमान की। हनुमान जैसा तो हनुमान ही हुआ है। महाभारत काल में अर्जुन का कृष्ण के प्रति समर्पण अद्वितीय है। विवेकानन्द का अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस के प्रति समर्पण अनुकरणीय है। समर्पण का भाव कबीर के शब्दों मेंः-
’जब में था तब हरि नहीं, जब हरि है में नाहीं।
प्रेम गली अति सांकरी, तां में दो समाय।।
सूफी फकीर मेंसूर कहता है-
’आता है तुफान आने दे, किश्ती का खुदा खुद हाफिज है।
मुमकिन है लहरों पे बहता हुआ कोई साहिल आ जाए।’
ज्यों व्यक्ति इतने समर्पण में चला जाए, इतनी तन्मयता साध ले, उसके लिए जागने की काई जरूरत नहीं। जागने वाला स्वयं जागे। चिन्ता करने वाला स्वयं चिन्ता करे। समर्पण सत्य के प्रति हो सकता है। समर्पण आत्म-दर्शन के प्रति हो सकता है। समर्पण चैतन्य के प्रति हो सकता है। समर्पण गुरू के प्रति हो सकता है। गुरू के प्रति समर्पण इसीलिए हो सकता है कि गुरू कोई व्यक्ति नहीं होता। वह आत्मदर्शन और चैतन्य की महायात्रा का सहयात्री होता है, सहयोगी होता है। गुरू के प्रति समर्पण, सत्य के प्रति समर्पण या चैतन्य के प्रति समर्पण- ये सब पर्यायवाची हैं। शरण में जाने का अर्थ है- तन्मय हो जाना। शरण में जाने का अर्थ है- तद्रूप हो जाना। शरण में जाने का अर्थ है- द्वैत से अद्वैत साध लेना। शरण में जाने का अर्थ है-अभिन्न हो जाना, भेद को समाप्त कर अभेद साध लेना। शरण लेने वाले और शरण देने वाले में कोई अन्तर नहीं होता। शरण में जाने वाला वही हो जाता है जिसकी शरण में गया है। प्रज्ञा की शरण में जाने वाला स्वयं प्रज्ञा बन जाता है। गुरू की शरण में जाने वाला गुरू बन जाता है। प्रभु की शरण में जाने वाला प्रभु बन जाता है। विनोबा से एक भाई ने पूछा, ’आपकी भक्ति का स्वरूप क्या है ? विनोबा ने उत्तर दिया-मेंरी भक्ति का स्वरूप है-प्रभु। में तुम्हारा अतीत हूं और तुम मेंरे भविष्य हो। वर्तमान में में तुम्हारा अनुभव करूं, यही मेंरी भक्ति है।’ अनागत में होना है, अतीत को छोड़ना है। और वर्तमान में वैसा रहना है।
समर्पण का एक क्रम है - पहले श्रद्धा, तत्पश्चात् समर्पण उसके बाद पराक्रमें सबसे पहला तथ्य है- श्रद्धा। दुनिया में आज तक कोई भी व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हुआ जिसमें श्रद्धा का अभाव रहा हो। भ्रान्तिवश लोग श्रद्धा और अंधविश्वास को एक मानते हैं। यह भ्रांत मान्यता है। श्रद्धा और अंधविश्वास कोई मेंल ही नहीं है। श्रद्धा का अर्थ है- सच्चाई को जान लेने के पश्चात् उसके प्रति घनीभूत आस्था का प्रकट होना। जानने के बाद श्रद्धा होती है। अंध विश्वास में जानने, न जानने का प्रश्न नहीं होता है।। वहां अंधानुकरण होता है, वहां भेड़ चाल होती है। जब तक सच्चाई के प्रति घनीभूत आस्था नहीं होती, वह सच्चाई जीवन में कभी फलित नहीं होती। श्रद्धा में घनीभूत प्रेम होता है। श्रद्धा होने के बाद खण्डित नहीं होती, अंधविश्वास तो टूटता - जुड़ता ही रहता हैं।
श्रद्धा के बाद होता है- समर्पण। जब श्रद्धा होती है तब हम उस ध्येय के प्रति सर्वात्मना समर्पित हो जाते है। पूरा समर्पण होता है। समर्पण वह होता है जो सर्वथा शर्त या प्रतिबद्धता से मुक्त हो। उसमें फिर जो भी आए, उस स्थिति को देखते जाओ, झेलते जाओ किन्तु समर्पण पर कोई आंच न आने पाए। समर्पित साधक का स्वर होता है-
’अवगुण मेंरे बापजी, बख्शो गरीब नवाज।
हों तो पूत कपूत हंू, तऊ पिता को लाज।।
श्रद्धा और समर्पण के बाद आता है - पराक्रमें कोई भी गुरू यही नहीं कहता कि तुम श्रद्धा और समर्पण करने बैठ जाओ। सब कुछ घटित हो जायेगा। गुरू गति देगा। गुरू चलायेगा। गुरू कहेगा- पराक्रम करो, पुरूषार्थ करो। बैठो मत, चलो, चलते ही रहो। यह नास्तिक विचारधारा है कि समर्पित व्यक्ति कायर होता है, कामचोर होता है, प्रमादी होता है, भाग्यवादी होता है। ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिलता मानव के इतिहास में, जहां श्रद्धा एवं समर्पण ने व्यक्ति को कायर, प्रमादी या भाग्यवादी बनाया हो।
पूर्ण समर्पण के बाद एक महान शक्ति का आन्तरिक विस्फोट होता है और वह शक्ति व्यक्ति को पराक्रमपूर्ण कर्म की ओर प्रेरित करती है। भले ही आत्मा शोधर्थी हो, भले ही समाज सुधारक हो, भले ही मानवतावादी हो, भले ही राष्ट्रवादी हो। जहां उद्देश्य के प्रति समर्पण हुआ, वहां प्रचण्ड पराक्रम का तुफान चल पड़ता है। वह अकेला ही लाखों के बराबर शाक्तिशाली हो जाता है। भाग्य उसकी मुट्ठी में आ जाता है। प्रकृति का चप्पा-चप्पा उसके साथ हो लेता है। अतः इस भ्रान्ति को अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए कि श्रद्धालु व्यक्ति कायर और प्रमादी व्यक्ति होता है। जब अंशी और अंश एक हो जाते है तब अंश अंशी ही हो जाता है। जब भगवान और भक्त एक हो जाते हैं तो भक्त भगवान ही हो जाता है। भक्त की शक्ति एवं पराक्रम असीम हो जाते है। समर्पित व्यक्ति ही पूर्ण अभय को प्राप्त होता है। अकबर के समय की बात है। एकबार तानसेन से अकबर ने उसके गुरू से संगीत सुनने की इच्छा जाहिर की। तानसेन ने कहा- ’असंभव है यह। आप बुलायंगे तो भी वे नहीं आयेंगे क्योंकि उनको आपसे लेना देना ही क्या है ?’ वेश बदलकर दोनों वृन्दावन पहंुचे। तानवसेन भीतर गया। उसने गाना शुरू किया। जानबूझकर गलत राग गाने लागा। गुरू ने तत्काल टोका और स्वयं ने गाना शुरू किया। अकबर सुनकर मुग्ध हो गया। और तानसेन से कहा, तानसेन! तुम्हारा गाना मुझे अब फीका सा लगता है। उसमें कोई रस नहीं आता। तानसेन ने कहा, ’हुजूर! में गाता हूं दिल्ली के बादशाह को राजी रखने के लिए, प्रसन्न करने के लिए। मेरा गुरू गाता है परमात्मा को राजी रखने के लिए।’ बड़ी उपलब्धि के लिए बड़े के प्रति सपर्पित होना जरूरी है।
आराधना का चौथा सूत्र है- अपने आपको देखना। स्वयं के द्वारा स्वयं को देखना। आत्मा के द्वारा आत्मा को देखना। ज्ञात बहुत थोड़ा है, अज्ञात बहुत अधिक है। हम बहुत कम जानते है, जानना अवशेष बहुत है। चेतना की गहराई में ही अज्ञात की जानकारी हो सकती हैं। चेतना के सतह पर तो काम, क्रोध एवं वासनाएं है। अपने आपको देखने का अर्थ है चेतना की गहराई में प्रवेश करो, अन्तस्थल में गोते लगाओ और भीतर जो कुछ छिपा पड़ा है उसे अनावृत करो, बाहर लाओ और उपयोग करो। महानता अन्तःस्थल में छिपी रहती है। क्षुद्रता सतह पर तैरती है। प्रत्येक व्यक्ति में महानता होती है। पर वह सदा छिपी रहती है। जो चेतना की गहराई में गोता नहीं लगाता वह महानता को उपलब्ध नही कर सकता। महान् व्यक्तित्व उसी को उपलब्ध होता है जो निरन्तर अपने आपको देखता है और अपनी गहराईयों में डूबकियां लगाता है।
लोगों का सामान्य विश्वास यही है कि आंख खुली रहने पर रंग दिखाई देता है, प्रकाश दिखाई देता है। आंख बंद करने पर न रंग दिखाई देता है और न प्रकाश दिखाई देता है। आश्चर्य की बात यह है कि साधनाकाल में आंख बंद होने पर भी रंग दिखाई देता है, प्रकाश दिखाई देता हैं। यह यथार्थ अनुभव है। जो व्यक्ति चेतना के सागर में प्रवेश करता है, उसे अज्ञात सत्य ज्ञात होने लग जाता है। जो व्यक्ति अपने आपको नहीं देखता वह दूसरों को देखता है। दूसरों को देखना महानता की अनुभूति की सबसे बड़ी बाधा है। क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या, कलह, निंदा, ये सब महानता के बाधक तत्व है। ये सब तत्त्व दूसरो को देखने से फलित होते है। क्रोध दूसरों को देखने से आता है। क्रोध दूसरे से सम्बन्ध रखता है। क्रोध आने में दो चाहिए। इसी प्रकार अहंकार भी दूसरो को देखने से आता है। अहंकार छोटों पर आता है। जब व्यक्ति दूसरे को अपने से छोटा देखता है तब अहंकार पैदा होता है। वह अनुभव करता है- इसके पास कुछ भी नहीं है। इसके पास कहां हैं ज्ञान, इसके पास कहां है वैभव एवं सत्ता। मेंरी जाति कितनी महान है। यह तो छोटी जाति का है। जब व्यक्ति अपने से छोटों को अहंकार जागता है। जब व्यक्ति अपने से बड़ों को देखता हे तो हीन भाव जागता है। दोनों अहंकार के ही रूप है। जो व्यक्ति अपने आपको देखना नहीं जानता वह या तो अहंकार से भर जायेगा या हीन भावना से भर जायेगा। निंदा भी दूसरों को देखने का परिणाम ही है। दूसरों पर आरोप लागने के परिणाम भयंकर होते है। यह महपतन का एक भयंकर तरीका है। दूसरों पर आरोप लगाने वाला, दूसरों पर आरोप लगाने से पूर्व स्वयं आरोपित हो जाता है। इन सब बुराइयों का समाप्त करने का एक मात्र उपाय है- आत्मा दर्शन, एवं दर्शन की भावना को विकसित करना।
हमारी चेतना मुख्यतः दो केन्द्रों में विचरण करती है। एक है नाभि के नीचे का केन्द्र और दूसरा है नाभि के ऊपर का केन्द्र हृदय से मस्तिष्क तक का केन्द्र। जब-जब चेतना अधोगामी होती है तब तब लालच, क्रोध, भय, स्वार्थ आदि वृत्तियां जागती है। जब चेतना ऊर्ध्वगामी होती है तब अभय, अहिंसा, प्रेम, परमार्थ की भावना जागती है। अन्तःदर्शन में शरीर के ऊपरी अंगो का मन की आंखो से दर्शन करने का अभ्यास करना होता है, विशेषकर नासाग्र या भ्रकुटी या ललाट मध्य क्षेत्र।
अपने आप को देखने का सबसे सरल प्रभावशाली तरीका है- श्वास-दर्शन। हम श्वास से जी रहे हैं इसलिए सबसे पहले हमारी सत्य की खोज श्वास से ही प्रारम्भ होनी चाहिए। हमारे दर्शन के चार आयाम है- पहला आयाम है शरीर, दूसरा है श्वास, तीसरा है मन और चौथा आयाम है शुद्ध चेतना अथवा आत्मा। ये सारे आयाम सत्य की खोज के आयाम है। इन सब में श्वास का आयाम स्थूल भी है तथा सूक्ष्म भी है तथा सूक्ष्म भी है। श्वास बड़ा सत्य है। श्वास भीतर जाता है उसके साथ अनेक द्रव्य भीतर जाते हैं। प्राण तत्त्व भी भीतर जाता है। जिस किसी ने प्राण की साधना की है, वह जानता है कि श्वास के साथ प्राण की ऊर्जा किस रूप में भीतर जाती है। उसके कितने आकार बनते हें और वे आकार निरन्तर आंख के सामने घुमते रहते है। आंख खुली होती है तब भी दिखाई देते हैं और आंख बंद होती हे तब भी दिखाई देते है। जब व्यक्ति प्राण की साधना में चलता है तब आकाश मण्डल में व्याप्त प्राण के परमाणु आकार लेना प्रारम्भ कर देते हैं। आकार बदलते रहते हैं। बदलते बदलते जो अन्तिम आकार होता है वह ओंकार की प्रतिकृति होता है। इसीलिए ओंकार को शिवस्वरूप माना गया है।
प्राण शक्ति का बड़ा स्रोत है-श्वास। श्वास के साथ केवल रासायनिक द्रव्य ही नहीं जाते, प्राण धारा भी जाती हे, प्राण शक्ति जाती है। संकल्प जितना पुष्ट होता है प्राण शक्ति का प्रवाह भी उतना ही अधिक हो जाता है। जब हम श्वास दर्शन करते हैं तब प्राणशक्ति और अधिक बढ़ जाती है। श्वास बाहर और भीतर का सेतु है। श्वास के साथ प्राण शक्ति चलती है। प्राण शक्ति अर्थात् चैतन्य। पर श्वास की चैतन्य स्थिति निम्न स्तर की है। इस निम्न स्तर की चैतन्य शक्ति के सम्बल से ही उच्चतम चैतन्य शक्ति तक पहुंचा जा सकता है।
चेतना का मूल स्वाभाव है- जानना और देखना। अर्थात् ज्ञाताभाव और दृष्टाभाव। जानना और देखना - ये दो क्रियाएं नहीं है - एक ही क्रिया की दो स्थितियां है। एक क्रिया है- साक्षीभाव। श्वास को भी केवल जानना है, देखना है। श्वास दर्शन साधना का पहला कदम है। सही दिशा में उठाया गया पहला कदम मेंजिल तक पहुंचने वाले असंख्य कदमों की श्रृंखला का एक अंश होता है। वही मेंजिल का आदि कदम है। श्वास को देखना आत्म साक्षात्कार की मेंजिल तक पहुंचने का पहला कदम है। श्वास दर्शन में सोचना छूट जाता है, केवल देखना शेष रह गया है। देखना शुरू करते ही विचारों पर, विकल्पों पर प्रहार होने लग जाता है। वे बेचारे टृटने लग जाते हैं। विकल्पों से हटकर अविकल्पों पर और चिन्तन से हटकर अचिन्तन पर कदम बढ़ने लगते है।
देखने का स्रोत है- आंख। आंख बंद कर दी। बंद आंखो से कल्पना के द्वारा श्वास को देखना है। केवल देखना है। देखना है, वहां विचारना नहीं है और विचारना है, वहां देखना नहीं हे। विचारना नहीं है, केवल देखना है। देखने का अभ्यास के बिना जागरण फलित नहीं होता, अप्रमाद फलित नहीं होता। जागृति हमारी विवेक चेतना को स्पष्ट करती है। विवेक ही आत्मा की आंख है। विवेक की आंख से ही प्रभु को देखा जा सकता है। प्रभु दर्शन ही, आत्मा दर्शन ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। देखते-देखते ही वह बिन्दु आ जाएगा जहां देखना शेष नहीं है। चरम आ जाएगा। वहां केवल जानना एवं देखना ही अवशेष रहेंगे। यह यात्रा का अन्तिम बिन्दु है।
श्वास-दर्शन के साथ नाम स्मरण भी चलते रहना चाहिए। स्मरण में अपने-अपने इष्ट के नाम का जप हितकर होता हैं। जप भी बहुत शक्तिशाली साधन है। मन को दर्शन एवं स्मरण में लगाए रखने से मन की गति भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। जप का अर्थ केवल शब्द का उच्चारण मात्र नहीं है। जप को अर्थ होता है-शब्द के उच्चारण के माध्यम से किसी परम शक्ति की सन्निधि को प्राप्त कर लेना।
सुख और दुःख मन के धर्म है। आत्मा न सुखी है, न दुःखी। आत्मा परमात्मा का अंश है। परमात्मा आनंद स्वरूप है तो आत्मा भी आनंद स्वरूप ही है। आनंद हमारा सहज स्वरूप है। शीतलता जिस प्रकार पानी का सहज स्वभाव है। उसी प्रकार आनंद भी हमारा सहज स्वभाव है। सुख भी टिकता नहीं और दुःख भी टिकता नहीं। सुख और दुःख दोनों भूल है। आनंद आने के बाद कभी जाता नहीं। संसार के विषय आनंद नहीं देते, सुख या दुःख देते है। जो सुख देता है वही दुःख भी देता है। संसार के पदार्थ तो जड़ हैं। जड़ पदार्थ में आनंद संभव नहीं हो सकता। जड़ पदार्थों में जीव को जो कुछ भी आनंद का भास होता है वह अन्दर के चैतन्य के स्पर्श से ही होता है। जब मन जड़ पदार्थो में तदात्मकार होता है तब एकाग्रता के कारण चित्त में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है और उसके कारण आनंद का आभास होता है। यह सब मन के अन्तर्मुखी होने से होता है। पर ज्यों ही मन बहिर्मुखी होता है उसे व्यग्रता, बैचेनी, अशान्ति पुनः घेर लेते है। नींद में आपको शान्ति मिलती है। क्यों मिलती है ? इसलिए कि मन उसे समय पूर्णतः अनतर्मुखी होकर सो जाता है। नींद में जम जगत को भूल जाता है आनंद जगत में नही जगत को भूलने में है। मन में जब तक संसार है, तब तक मन भी जलता रहता है, परन्तु मन में संसार न रहे तो मन शान्त हो जाता है। संसार को छोड़कर तो कहीं जा सकते नही। अतः संसार को मन से ही निकालना होगा। मन में से संसार यों निकलाता नहीं। किसी सम्यक एवं सघन साधना द्वारा ही यह संभव हैं। साधना भी एक तप है। परिश्रम करना होता है, समय लगाना होता हे। 

Thursday, 1 August 2013

कल आज और कल(जन्मो का रहस्य)

कुछ बातें है ऐसी होती है जिनको न सिर्फ समझना बेहद कठिन है बल्कि असंभव भी है। लेकिन दिमाग  चैन से कहाँ बैठता है। ज़हन में कई प्रश्न आते-जाते रहते हैंजिनका हल खोज पाना अपने वश की भी बात नहीं है, लेकिन फिर भी चुप-चाप थोड़े ही न बैठना है। यह दुनिया रहस्यों से अटी पड़ी है। यूँ तो अधिकतर रहस्यरहस्य ही रह जाते हैं। लेकिन उनके तह तक जाने की कोशिश जारी रहती है ।ऐसे ही रहस्यों से घिरे हुए हैं पूर्वजन्म और पुनर्जन्म । मन तो कहता हैविश्वास कर लें कि पूर्वजन्म भी है और पुनर्जन्म भी। लेकिन दिमाग उसे मानने को तैयार नहीं होता। 

शायद आपको याद हो 80 के दशक में ऋषि कपूर अभिनीत फिल्म आई थी ‘कर्ज़। अपने समय की बहुत ही हिट फिल्म थी। आज भी वो फिल्म अंत तक बांधे रखती है  उसकी पटकथा पुर्नजन्म के इर्द-गिर्द ही घूमती है । राज किरण की हत्या और उसी का ऋषि के रूप में पुनः जन्म लेना। हाल ही में एक और फिल्म इसी से मिलती जुलती आई थीओम शान्ति ओम। उस फिल्म में भी पुनर्जन्म की बात दिखाई गयी है। एक टीवी सीरियल ‘राज़ पिछले जन्म का’ में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला। ये तो हुई फिल्म और टेलीविजन की बातें। वास्तविक जीवन में भी कभी-कभी, ऐसी अनहोनी बातें, सुनने को मिल ही जातीं हैं कि फलाने बच्चे को अपने पिछले जन्म की बातें याद हैं। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा कुछ होता है ?
समूचा प्राणी जगज दो अवस्थाओं से गुजरता है। वह जन्म लेता है यह पहली अवस्था है। एक दिन वह मरता है यह दूसरी अवस्था है। जन्म हमारे प्रत्यक्ष है और मौत भी हमारे प्रत्यक्ष है। जन्म भी एक घटना है और मौत भी एक घटना है। ये दोनों घटनायें प्रत्यक्ष हैं। हजारों वर्षों से मनुष्य यह जानने के प्रयत्न करता रहा है कि जन्म से पूर्व और मृत्यु के पश्चात् क्या ? यह पूर्व और पश्चात् की जिज्ञासा दर्शन के प्रारम्भिक क्षणों में हो रहीं है। इसका उत्तर उन लोगों ने दिया जो प्रत्यक्ष ज्ञानी थे, जिनका अपना अनुभव और साक्षात्कार था। उन्होंने कहा, ’जन्म के पहले भी जीवन होता है और मृत्यु के बाद भी जीवन होता है। ’यह हमारा वर्तमान का जीवन जो प्रत्यक्ष है, एक मध्यवर्ती विराम है, जो पहले भी है और बाद में भी है पूर्वार्द्ध है तभी उतरार्द्ध हो सकता है। जिसका पूर्व नहीं और पश्चात् नहीं है उसका मध्य कैसे होगा ? यदि मध्य है तो उससे पहले भी कुछ था और बाद में भी कुछ होगा। अनुभव और प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर उन्होनें इसका समाधान किया किन्तु जब अनुभव की बात, साक्षात् ज्ञान की बात, प्रत्यक्ष की बात परोक्ष ज्ञानियों तक पहुंचती है तब उसकी भी मीमांसा प्रारम्भ हो जाती है। कहने वाला प्रत्यक्ष ज्ञानी है, अनुभवयुक्त है और वह अनुभव के आधार पर कह रहा है किन्तु सामने वाला व्यक्ति परोक्ष ज्ञानी है वह प्रत्यक्ष ज्ञानी के अनुभव को नहीं पकड़ पाता, केवल उसके शब्दों को पकड़ पाता है। वह प्रत्येक तथ्य को तर्क की कसौटी पर ही स्वीकार करता है।
अतः इस प्रश्न का उत्तर बुद्धिवादी दार्शनिकों ने अपने ढंग से दिया। जहां तर्क है, वहां खेमे बनते हैं। बुद्धिवादी दार्शनिकों ने तर्क दिया - न पूर्वजन्म है और न पुनर्जन्म है। केवल वर्तमान जीवन ही होता है। दो धाराएं बन गई। एक को आस्तिक कहा गया और दूसरी को नास्तिक कहा गया। एक है आत्मा को मानने वाली धारा और दूसरी है आत्मा को न मानने वाली धारा। नास्तिकों ने चेतना को तो स्वीकार कर लिया पर त्रैकालिक चेतना को अस्वीकृत किया। उन्होंने केवल वर्तमानकालिक चेतना को मंजूर किया। उनका तर्क था- वर्तमान में कुछ ऐसे परमाणुओं का, ऐसे तत्त्वों का योग होता है कि उनके योग से एक विशेष प्रकार की शक्ति उत्पन्न होती है, चेतना उत्पन्न होती है। जब यह शरीर बिखरता है, शरीर की शक्तियां बिखरती है और जब विशिष्ट प्रकार के परमाणुओं की इस संयोजना का विघटन होता है तब चेतना समाप्त हो जाती है। जब तक चेतन तब तक जीवन। जीवन समाप्त, चेतना भी समाप्त। उसके पश्चात् कुछ भी नहीं है। न पहले चेतना और न बाद में चेतना। जो कुछ है वर्तमान है। न अतीत और न भविष्य।

तीसरे चरण में इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयत्न किया वैज्ञानिकों ने। उन्होंने प्रयोग की कसौटी पर इस प्रश्न को कसना प्रारम्भ किया। लगभग पचास वर्षों से इस दिशा में विभिन्न प्रयोग हुए हैं और आज भी अनेक वैज्ञानिक इस ओर प्रयत्नशील हैं। इसकी खोज के लिए विज्ञान ने एक शाखा स्थापित की। उसे परामनोवैज्ञानिक कहा गया। मनोवैज्ञानिकों ने आत्मा के अस्तित्व को स्पष्ट करने के लिए पूर्व जन्म और पुनर्जन्म को जानने के लिए प्रयत्न किए। परामनोविज्ञान की चार मान्यताएं हैं-

1. विचारों का संप्रेषण होता है। एक व्यक्ति अपने विचारों को, बिना किसी माध्यम के दूसरों तक पहुंचा सकता है।
2. प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। एक व्यक्ति बिना किसी माध्यम के घटनाओं एवं दृश्यों को दूर बैठ देख सकता है।
3. पूर्वाभास होता है। भविष्य में घटने वाली घटना का पहले ही आभास हो जाता है।
4. अतीत का ज्ञान होता है। जैसे भविष्य का ज्ञान होता है वैसे ही अतीत का ज्ञान हो सकता है।

परामनोविज्ञान के द्वारा मान्य इन चार तथ्यों के आधार पर यह सोचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि ऐसा भी तत्त्व है जो भौतिक नहीं है, पौद्गलिक नहीं है। इस संसार का मूल प्रश्न है कि क्या इस दुनिया में मात्र भौतिक तत्त्व ही है या भौतिक से भिन्न भी कुछ है। यदि यह स्वीकार हो जाता है कि इस जगत में केवल भौतिक तत्त्व ही नहीं है, अभौतिक तत्त्व भी है तो पूर्वजन्म और पुनर्जन्म को स्वीकृति दी जा सकती है। प्रश्न है आत्मा का, प्रश्न है अभौतिक तत्त्व का, अपौद्गलिक तत्त्व का। विज्ञान ने तथा अनात्मवादियों ने यही माना कि हम जिस जगत में जी रहे हैं, वह भौतिक है। केवल पदार्थ ही पदार्थ। पदार्थ की सीमा में विचरण करने वाला व्यक्ति आत्मा तक नहीं पहुंच पाता। हमारे ज्ञान की शक्ति बहुत स्थूल है। हमारे जानने का पहला साधन है-इन्द्रियंा। इन्द्रियां केवल स्थूल पदार्थों को जान सकती हैं। दूसरा साधन है-मन। उसकी क्षमता भी बहुत सीमित है। तीसरा साधन हैं-बुद्धि। बुद्धि का व्यापार भी सीमित ही हैं। इन्द्रियों के द्वारा जो प्राप्त होता है उसका ज्ञान मन को होता है और जो मन को प्राप्त होता है उसका विवेक और निर्णय करना बुद्धि का काम है। तीनों की बहुत छोटी दुनिया है।
फिर प्रश्न उठता है- हम कैसे सिद्ध करें - पूर्वजन्म एवं पुनर्जन्म के विश्वास को। इसे सिद्ध करने के लिए हमारे पास कुछ आधार हैं। इन आधारों में पहला सशक्त प्रमाण है- स्मृति। स्मृति यानि जन्म की स्मृति। जन्म लेने वाल बच्चे को अपने पहले जन्म ही स्मृति होती है। उसे पता चलता है कि इससे पहले भी वह था। डॉ. स्टीवन्स आदि परामनोवैज्ञानिकों ने पूर्व जन्म एवं पुनर्जन्म की घटनाओं के अनेक आंकडे़ एकत्र किए। उनका विश्लेषण किया और नए नए तथ्य प्रकट किए। ऐसे उदाहरण मिले हैं कि बच्चों ने अपने पूर्वजन्म की घटनाओं का वर्णन किया। अपने पूर्वजन्म के माता-पिता, घर आदि को पहिचाना, अपनी मृत्यु का विवरण दिया। समाचार पत्रों में यदा कदा ऐसी घटनाएं पढ़ने को मिल जाती है। थोड़ी उत्सुकता जगाती है। पर अनुसंधान वृति के अभाव मंे हममें से कुछ इन घटनाओं को सही मान लेने हैं और कुछ झूँठ, कपाल कल्पित। इनमें से सभी घटनाएं सही होती है ऐसा तो मैं नहीं मानता, पर कुछेक घटनाएं बिल्कुल सही होती हैं। तो फिर प्रश्न यह उठता है कि ऐसी स्मृति सब बच्चों को क्यों नहीं होती ? इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-
जन्म एक दुःख है और मरण भी दुःख है। प्राणी जब जन्म लेता है तब भी बहुत दुःख का अनुभव करता है और जब मरता है तब भी बहुत दुःख का अनुभव करता है। जन्म से पूर्व बच्चे में पूर्वजन्म की स्मृति होती है किन्तु जन्म के समय इतनी भयंकर यातना से गुजरना पड़ता है कि उसकी सारी स्मृति नष्ट हो जाती है। जैसे किसी व्यक्ति को गहरा आघात लगता है तो उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है। या तो वह बेहोश हो जाता है या पागल। जन्म की घटना यातनापूर्ण घटना है। अतः इस स्मृति को भूलना सहज ही है। पूर्व जन्म की स्मृति की बात न कर यदि इस जन्म की स्मृति की बात करें तो आश्चर्य होगा कि हम 90 प्रतिशत बातें सहज ही भूल जाते हैं। धरती पर आने के आद 5-6 वर्ष भी विस्मृति में ही है। यह निश्चित है कि हम 5-6 वर्ष पहले ही धरती पर आ चुके थे पर स्मृति नहीं रहती। यदि पूर्व जन्म की सभी स्मृतियां बनी रहें तो निश्चित ही आदमी पागल हो जाएगा। में तो कहता हूं कि यदि इस जन्म की सभी स्मृतियां बनी रहे तो हम पागल हो जाएंगे। प्रकृति ने हमारे अस्तित्व की रक्षा के लिए विस्मृति का विधान किया है। भयंकर शारीरिक पीड़ा या अत्यन्त भय की स्थिति में आदमी मूर्च्छित हो जाता है। यह मूर्च्छा हमारे जिन्दा रहने का आधार है। प्रकृति का नियम है स्मृति उतनी ही रहती है जितनी से काम चल सके।
फिर प्रश्न होता है कि कुछेक लोगों को पूर्व जन्म की स्मृति कैसे रहती है ? ऐसा होना अपवाद है। प्रायः ऐसी स्मृतियां ऐसे प्राणियों में जिन्दा रहती है जो ऐसी स्मृतियों के बोझ से बोझिल नहीं हो सकते। सिद्ध महापुरूष ऐसी स्मृतियों को सहज ही संजोकर रख सकते हैं। रामकृष्ण परमहंस एवं विवेकानन्द का स्पष्ट उदाहरण हमारे सामने हैं। बाबाजी महाराज का पूर्व जन्म का वृतान्त एकदम प्रामाणिक है। वे खुद भी पूर्व जन्म की अल्प स्मृति को संजोए हुए थे। उनके माथे का लाल वैष्णवी टीका प्रत्यक्ष प्रमाण है। उनकी सुचितापूर्व वैष्णव जीवन शैली प्रमाणित करती हैं कि निश्चय ही वे वैष्णव संन्यासी थे। इसी तरह बहुत सारे प्रकरण महापुरूषों के जीवन से जुडे़ हुए हैं।
कुछ ऐसे सामान्य आदमी भी मिल रहे हैं जिन्हे अपने पूर्वजन्म की स्मृति है। विशेषकर बचपन में ऐसी स्मृतियां प्रबल होती है। किसी को बड़ा भयंकर आघात लगा, किसी के साथ किसी ने अपना बनकर भयंकर विश्वासघात किया, आत्महत्या द्वारा मरा, दुर्घटना में मरा या किसी हत्यारे ने जल्लादी तरीके से किसी को मारा। ऐसी स्थितियों में जब आदमी मरता है तो वह संस्कार इतना प्रगाढ़ हो जाता है कि भारी कष्ट होने पर भी वह लुप्त नहीं होता और निमित्त पाकर उभर आता है। ऐसे व्यक्तियों को पूर्वजन्म की स्मृति रह जाती है।
दूसरी बात यह है कि वर्तमान में प्रेत जीवन पर अनेक अनुसंधान हुए है। प्रेतात्मा है या नहीं- इस प्रश्न पर अनेक खोजें हुई हैं। इसके अन्तर्गत पहला प्रयोग किया गया-प्लेन्चेट का। इसमें मृतात्माओं का आह्वान किया जाता है और उनके साथ सम्पर्क स्थापित किया जाता है। उनको आह्वान कर कुछ प्रश्न पूछे जाते हैं और वे उन प्रश्नों का उत्तर देते हैं। इस प्रयोग में भी कुछ घटनाएं ऐसी घटित होती है जिन्हे नकारा नहीं जा सकता। जो उत्तर मृतात्माओं द्वारा मिलते हैं वे इतने यथार्थ इतने प्रामाणिक और सही होते हैं कि प्लेन्चेट का प्रयोग करने वाले कभी आत्मा को अस्वीकार नहीं कर सकते। उन्हीं आत्माओं का आह्वान किया जा सकता है जिनका मृत्यु के बाद अभी दूसरा जन्म नहीं हुआ है, वे जन्म के इन्तजार में है या फिर उन आत्माओ का आह्वान किया जाता है जो अधम कर्माें पर अतिशय आसक्ति के कारण प्रेतयोनि भोग रहे हैं। महान आत्मएं प्लेन्चेट से बात नहीं करती।
तीसरा प्रयोग है- माध्यम का। कुछ व्यक्ति मृत आत्माओं के अवतरण के सहज माध्यम होते हैं। उनके माध्यम से दूसरे व्यक्ति अपने सम्बन्धी मृत आत्माओं से बातचीत करते हैं। अपने यहां कई व्यक्तियों में पित्तरादि का अवतरण सुनते हैं। ऐसी कहानियों में शत-प्रतिशत सच्चाई तो नहीं होती पर 20 प्रतिशत बाते इनमें भी सही होती हैं।
चौथा प्रयोग है-सूक्ष्म शरीर के फोटो का। वैज्ञानिक किरलियान दम्पति ने एक विशेष प्रकार की फोटो पद्धति का आविष्कार किया। उसके द्वारा सूक्ष्म शरीर के फोटो लिए गये। प्रत्येक प्राणी और वनस्पति के आभा मंडल के फोटो लिए गए। मरते हुए व्यक्ति के फोटो लेने पर यह स्पष्ट दिखाई दिया कि इस शरीर की कोई ऐसी ही आकृति शरीर से निकल कर बाहर जा रही है। सूक्ष्म शरीर के फोटो से सचमुच एक क्रान्ति ला दी सारे आध्यात्मिक क्षेत्र में। जीवित अवस्था में भी हमारा सूक्ष्म शरीर बाहर निकलता है। उसका प्रक्षेपण बाहर होता है। उसके भी फोटो लिए गए। एक व्यक्ति ने अपने अनुभव में लिखा, ’मेरा बड़ा ;डंरवतद्ध ऑपरेशन होने वाला था। निर्धारित दिन में ऑपरेशन कक्ष में गया। सूंघनी से मुझे मूर्च्छित किया गया। ऑपरेशन प्रारम्भ हुआ। मेरा सूक्ष्म शरीर ऊपर चला गया। ऑपरेशन की सारी प्रक्रिया मैं ऊपर से देखता रहा। जैसे ही कहीं डॉक्टर से गलती हुई, मैनें तत्काल उसे टोका। ऑपरेशन पूरा होने पर मैं अपने स्थूल शरीर में आ गया।’ सूक्ष्म शरीर इस स्थूल शरीर को छोड़कर बाहर यात्रा करता है और कहीं दूर की घटनाओं को देख आता है। इस तरह के अनुसंधान से हमारे यहां योग में जो परकाया-प्रवेश का वर्णन मिलता है, वह सिद्ध होने जा रहा है। आदि शंकराचार्य के परकाया-प्रवेश का उदाहरण तो आप लोग जानते ही है। आज यह सिद्ध होने जो रहा है कि स्थूल शरीर ही अन्तिम सच्चाई नहीं है। इसके भीतर बहुत बड़ा सूक्ष्म जगत है। जिस रूस को नास्तिक लोगों का देश कहा जाता है उसी देश के वैज्ञानिक आज इन सूक्ष्म सत्यों को उजागर करने में लगे हुए हैं। ऐसा लग रहा है, यदि यही गति चलती रही तो रूस दुनिया का सबसे बड़ा आस्तिक देश हो जायेगा।
सूक्ष्म शरीर अत्यन्त सूक्ष्म परमाणुओं से बने होते हैं। शास्त्रीय भाषा में वे चतुःस्पर्शी परमाणुओं से बने होते हैं। मनोविज्ञान की भाषा में , वे न्यू किलोन कण से बने होते हैं। वे कण ऐसे हैं जिनमें भार नहीं। उन कणों में विद्युत आवेग नहीं है। उन कणों में प्रस्फुटन नहीं है। वे कण अभौतिक हैं। वे कण आरपार जा सकते हैं। मृत्यु के समय यह सूक्ष्म शरीर बाहर निकलता है। उसका ही फोटो संभव है। तेजस् शरीर का फोटो प्लेट पर आता है, आत्मा का नहीं। आत्मा का कोई फोटो नहीं हो सकता।
प्राचीन काल में मृत्यु की घटना को श्वास के साथ जोड़ा जाता था। आज मृत्यु का सम्बन्ध आभा मंडल की क्षीणता या अक्षीणता के साथ जोड़ा जाता है। यदि आभा-मण्डल पूर्णरूप से समाप्त हो गया है तो प्राणी की मृत्यु घटित हो जाती है। यदि आभा मण्डल अवशेष है तो प्राणी जीवित है, अभी मरा नहीं है। हृदय का बंद होना, मस्तिष्क का फेल होना मृत्यु के पूर्व संकेत नहीं है। ये अधूरे संकेत है। आभा मण्डल यदि पूरा विसर्जित हो गया है तो मृत्यु समझनी चाहिए।
जो मृत्यु को नजदीकी से समझ रहें हैं त्यों-त्यों पूर्वजन्म एवं पुनर्जन्म की गुत्थी सुलझती चली जा रही है। पूर्व जन्म का एक सशस्त प्रमाण हमारे ये सगे-संबंधी, मित्रगण आदि हैं। आप कितने ही व्यक्तियों से संबंध जोड़ते हैं, पर देखते हैं, शनै-शनै सब छूटता चला जा रहा है। आपके साथ केवल वही व्यक्ति ही अन्तिम श्वांस तक रह जाते हैं जिनका आपके साथ पूर्वजन्मों का सम्बन्ध है। जननी तो सभी के होती है पर मां किसी विरले को ही मिलती है। मां कौन ? जो अपने बच्चे को अपना हृदय लुटाते हुए मानवता की सर्वोच्च ऊचाँइयों पर पहुंचाती है। ऐसी जननी पूर्वजन्म के सम्बन्धों से ही प्राप्त होती है। पत्नी सभी के होती है पर अर्द्धांगिनी किसी विरले पुरूष को ही प्राप्त होती है। पुत्र-पुत्रियां तो सभी के हैं पर ये आपकी फोटो स्टेट कॉपिया ही हैं, आपका मूल स्वरूप नहीं है। गुरू शिष्य सम्बन्ध तो चले आ ही रहे हैं इस जगत में। पर ऐसे गुरू-शिष्य पूर्वजन्म के सम्बन्धों से ही सम्भव है जो एक दूसरे को बिना भाषा के ही पूरा-पूरा जानते हैं। आप इस दुनिया में संबंध जोड़ते है, सम्बन्ध टूटते हैं। आप हाय-हाय करते हैं, धोखा हो गया है। आप भूल जाते हैं-

’अरे मेरे दिल रूबा, 
जो तेरा न था उसको अपना क्यों कहा ?
विश्वास कीजिए इस बात पर कि आपके होकर वही लोग अन्तिम समय तक आपके साथ रहेंगे जिनका आपके साथ पूर्वजन्मों का सम्बन्ध है बाकी तो सब परिचयात्मक सम्बन्ध मात्र ही हैं जैसे किसी गाड़ी में यात्रा करते वक्त सहयात्री से सम्बन्ध हो जाते हैं।
इस विवेचन के पश्चात् अब शास्त्रीय चर्चा भी कर ली जाए कि पूर्वजन्म एवं पुनर्जन्म के संबंध में हमारे शास्त्र क्या बोल रहे हैं। हमारे यहां शास्त्रों में दो प्रकार की योनियां मानी गई हैं। 1. योनिक 2. अयोनिक। प्रलय के बाद सृष्टि के आरम्भ में जो देह निर्मित हाती हैं वे सब अयोनिक होती है। इस प्रकार की देह सृष्टिकर्ता के संकल्पवश परमाणु पंुज के संघटक से उत्पन्न होती है। हमारे पुराणों में ऐसी बहुत सारी घटनाएं चर्चित हैं जब किसी व्यक्ति का जन्म अयोनिक पद्धति से हुआ है। दृष्टिपात से, स्पर्श से, संकल्प से वचन से योनियां प्रकट हुई हैं। गोरखनाथजी महाराज द्वारा गुगल के प्रयोग से गोगा का जन्म हुआ, वर्णित है। आज का विज्ञान इस दिशा में ’टेस्टट्यूब’ बेबी से इसी दिशा में बढ़ रहा है।
योनियां चार तरह की मानी गई है-उद्भिज, स्वेदज, अण्डज, एवं जरायुज। इनमें उद्भिज, स्वेदज एवं अण्डज इन तीनों योनियों में चौरासी लाख जन्म माने गये है। चौरासी लाख जन्मों के बाद जरायुज स्थिति प्राप्त होती है। फिर जरायुज श्रेणी की उर्ध्वतम सीमा पर पहुंचकर दुर्लभ मनुष्य देह मिलती है। एक-एक श्रेणी में नाना प्रकार की क्रमोत्कृष्ट देह की प्राप्ति होती है। जीव बीज रूप से प्रकृति के गर्भ में आविर्भूत होकर क्रमशः ऊंचा उठता रहता है एवं क्रमंशः उत्कृष्टतर देह प्राप्त करता रहता है। पर ध्यान रखिए यह कृत-कर्म का फल नहीं है। प्राकृतिक स्त्रोत स्वाभाविक परिणाम का ही फल है अहंभाव की स्फूर्ति न होने तक जीव का कर्माधिकार नहीं होता है। मनुष्य देह प्राप्ति से पूर्व तक जीव पाप-पुण्य से परे होता है। सिंह जीव को मारकर खाता है, उसे कोई पाप नहीं लगता है। अतः एवं मनुष्य देह के पूर्व तक चौरासी लाख देहों में संचरण केवल प्राकृतिक व्यापार ही है। उसके मूल में व्यक्तिगत इच्छा या कर्म-प्रेरणा नहीं है। परन्तु मनुष्य देह के साथ संसर्ग होते ही कतृर्व्य अभिमान पैदा हो जाता है एवं इसीलिए कर्माधिकार की उत्पत्ति एवं फलभोग आवश्यक हो जाता है। यहां से आपके कर्माें का कम्प्यूटर सक्रिय हो जाता है जो कई जन्मों के बाद प्रारब्ध कर्म बन जाता है। मनुष्य देह में निर्णय, संकल्प, विवेक, स्वविवेक पर आश्रित होते हैं। यहां ’जैसी मती वैसी गति’ हो जाती है। अपने जीवन को सार्थक ढंग से चलाने के लिए सभी आवश्यक उपकरण हमें मुहैया कराये जाते हैं। मनुष्य देह में आने के बाद प्राकृतिक स्त्रोत का प्रभाव नहीं रहता। जीव स्वकृत कर्मों से उर्ध्व या अधोगति प्राप्त करता है। अब तक की गति सरल एवं उर्ध्वमुखी थी पर मनुष्य देह की प्राप्ति के पश्चात् कर्म की गति वक्र चक्राकर एवं अनन्त वैचित्रयमयी हो जाती है। मनुष्य देह के साथ ही देहाभिमान एवं ममकार जाग्रत हो उठते हैं। यहां हम जो-जो करते हैं, उसका फल सुनिश्चित है। मनुष्य देही में हमें पांचो कोश प्राप्त हो जाते हैं, यथा-अन्नमय $ कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश एवं आनन्दमय कोश। अन्य प्राणियों में केवल दो कोश ही, अन्नमय एवं प्राणमय, विकसित होते हैं। मनुष्य यदि प्रयत्न एवं पुरूषार्थ करे तो, ’अन्तिमकोश’ की पहुंच भी उसके लिए संभव है।
मनुष्य देह की प्राप्ति के बाद जन्म मरण का चक्र चालू हो जाता है। मृत्यु के बाद जब स्थूल देह को त्यागकर जीवात्मा बाहर आती है तो अपने साथ सूक्ष्म शरीर को लेकर चलता है। सूक्ष्म शरीर में मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार होते हैं। पूर्वजन्मों के कर्माें की एक रील इस सूक्ष्म शरीर के साथ चलती है। मृत्यु के समय जो संस्कार या भाव प्रबल हो जाते हैं, वे पूर्व संचित दूसरें भावों को उद्बुद्ध करके अपने में मिला लेते हैं एवं पिण्डीभूत होकर प्रारब्ध कर्मों की सृष्टि करते हैं। हमारे यहां कहावत है- अन्त मता सो गता। पर अन्त का मता वही होता है जो जीवन भर का मता होता है। ’जनम जनम मुनि जतन कराहीं, अन्त काल प्रभु आवत नाहीं,।’ अन्तिम विचार या चिंतन वही होगा जो आपने जीवन भर पाल पोष कर पुष्ट कर रखा है। दयालु के प्राण करूणा जनित भावों के साथ ही छूटेंगे। हिंसक के प्राण हिंसा भाव के साथ छूटेंगे। जीवनभर की साधना एवं अभ्यास अन्तिम क्षणों का निचोड़ होता है। जीव प्रारब्ध कर्मांे के अनुसार गति प्राप्त करता है। जो जीवन भर कृष्ण मय रहा वही व्यक्ति अन्तिम समय कृष्णमय रह सकता है। इस नियम के कुछ व्यक्ति ही अपवाद होते हैं उसके भी कुछ सूक्ष्म कारण होते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
’यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजन्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।
अर्थात् मनुष्य जिस भाव का स्मरण करता हुआ अन्तकाल में देह त्याग करता है उसी भाव को प्राप्त होता है।’
राजा भरत मृत्युकाल में हरिण के बच्चे की भावना करते हुए देहत्याग करने के कारण हरिण योनि को प्राप्त हुए थे, यह कथा पुराणों में प्रसिद्ध है। अतः सभी देशों में आस्तिक लोग मरते हुए व्यक्ति में सात्विक भाव जगाने के लिए विविध सद् आयोजन करते हैं। गीता भागवत सुनाना, साधु-संन्यासियांे का सत्संग करना, महापुरूषों के चित्र दिखाना आदि। हमारे यहां मृत्यु-विज्ञान पर बहुत जोर दिया गया है। एक कहावत प्रचलित है-जपतप में क्या धरा है, मरना सीखों।’ गोरखनाथजी महाराज तो आह्वान करते हैं-

’मरो वे जोगी मरो मरण है मीठा
तिस मरणि मरो रे जोगी जिस
मरणि मरि गोरख दीठा।

बाबाजी महराज का उपदेश था-’मौत बड़ी सुहावनी-
जो जीते जी मर गया वह मृत्यु से नहीं डरता। जो मृत्यु को जीत गया उसने जीवन के रहस्य को समझ लिया। जो निर्भय होकर प्राण त्यागता है वह अगले जन्म के पर्दे के आरपार भी झांक सकता है। ज्ञानी वही है जो अभय को प्राप्त हो गया। भगवान बुद्ध संन्यास दीक्षा से पूर्व मृत्यु-शिक्षा देते थे।

गति मृत्यु के अन्तिम भाव पर निर्भर करती है। साधारणतः परा और अपरा भेद से गति दो प्रकार की है। जिस गति से पुनर्जन्म नहीं, वह परा गति है। जिस गति में उर्ध्व अथवा अधः लोको में जाकर कर्मफल भोगने के पश्चात् पुनः मृत्युलोक में जन्म ग्रहण करना पड़ता है, वह अपरा गति है। देवता, मनुष्य, प्रेत, तिर्यक, आदि योनियों के भेद से गति भेद हुआ करता है। अर्थात् कर्मवश कोई देवलोक को जाता है और देव देह प्राप्त कर नाना प्रकार के दिव्य भोगों का आस्वादन करता है। कोई यातना-देह पाकर नरक-यंत्रणा भोगता है। कर्मक्षय होने पर पुनः मनुष्य देह प्राप्त करता है। इस जगत में तीन तरह के नर -देही उपलब्ध है। 1.सुर या देव वृति के आदमी, 2.असुर या पाशविकवृति के आदमी, 3.मनुष्यवृत्ति के आदमी।
प्रथम पंक्ति के आदमी ’परोपकाराय सतां विभूतयः’ होते हैं। ऐसे व्यक्ति जन-कल्याण हेतु ही जन्मते हैं या इच्छा जन्म लेते है। ऐसे लोगों की पूर्व स्मृतियों सम्यक् रूप से बनी रहती है। उनका लक्ष्य जगत कल्याण में लगा रहता है तथा इस उद्देश्य के साथ-साथ अपनी आध्यत्मिक साधना द्वारा अपने जीवन को भी वे उत्कृष्टतम श्रेणी तक ले जाते हैं। इन महापुरूषों में से कई तो जीवन मुक्त हो जाते हैं। ऐसे लोगों का देह-विसर्जन के बाद पुनर्जन्म नहीं होता। ऐसे व्यक्ति पूर्ण निष्काम होकर शरीर को त्यागते हैं। जो पुरूष जीवनकाल में ही भावातीत हो गए हैं, जो सचमुच जीवनमुक्त है, उसकी कोई गति नहीं है। वासना शून्य होने पर गति नहीं रहती। वे ब्रह्ममय हो जाते हैं। वे ब्रह्माण्डीय परम चेतना से अभिन्न हो जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिए गीता कहती है-

’अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्तवा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्रभदावं यति नास्त्यत्र संशयः
अर्थात अन्तकाल में भगवत भाव का स्मरण करते हुए देह त्याग कर सकने पर भगवान का सायुज्य-लाभ प्राप्त किया जा सकता है, इसमें काई संदेह नहीं है।
कुछ महापुरूष जगत-कल्याण की सूक्ष्म वासना से बंधे रह जाते हैं। ऐसे महापुरूषों का अस्तित्व हजारों वर्षों तक सूक्ष्म देह में बना रह सकता है। परोक्ष रूप से जगत-कल्याण में लगे हुए अहर्निश निजानंद में लीन रहते हैं। ऐसे महापुरूष उस क्षीण जगत-कल्याण की वासना का क्षय होते ही ब्रह्मलीन हो जाते हैं। कबीर के शब्दों में

’जल में कुंभ, कुंभ में जल है,
बाहर भीतर पानी’
फूटा कुंभ जल-जल ही समाना,
यह तथ कथ्यो गियानी।’
ऐसा भी सम्भव है प्रबल जगत-कल्याण की भावना से भावित होकर मनुष्य देही में अवतरित हो जाते हैं। कालान्तर में वे भी केवल्य पद में पहुंच जाते हैं। कुछ महापुरूष देवलोक के अधिकारी बनकर जगत-कल्याण में निरत रहते हैं। ऐसे महापुरूषों का भी कालान्तर में जन्म अवश्य होता है।
मध्य-पंक्ति में मनुष्य देह आती है। मनुष्यवृति के व्यक्तियों के हाथों पाप एवं पुण्य दोनों अर्जित होते हैं। इस वृति के लाग सद् एवं असत् दोनों प्रकार की वृत्तियों में रमतें हैं तथा अपने-अपने कर्मफल के अनुसार दुःख सुख इस मृत्युलोक में ही भोगते रहते है। इनके लिए दानों दिशाएं खुली रहती हैं- नीचे जाएं या ऊपर उठें। यह मध्य का अस्तित्व जिम्मेदारी का अस्तित्व है। यहां बहुत कुछ स्व पुरूषार्थ से करना पड़ता है। ऊपर वाले तो पूर्ण जाग्रत अवस्था में हैं अतः उनकी गति तो उर्ध्वगामी ही होती है। नीचे वाले पूरी नींद में है अतः उनकी गति अधोगामि ही होती है। कोई विशेष कृपा ही ऐसे लोगों को बचा सकती है। हां, मध्य-पंक्ति के व्यक्तियों के लिए यह जगत ही खेल का प्रांगण है। यहां ही वे उठते हैं, यहां ही वे गिरते हैं। बार-बार मनुष्य देही में जन्मते हैं तथा कर्मफल के अनुसार सुख दुःख भोगते रहते हैं।
निम्न पंक्ति में असुर वृति के आदमी आते हैं जो होते तो नर-देही में हैं, पर उनके कर्म राक्षसों व पिशाचों जैसे होते हैं। ऐसे व्यक्ति ’पापाय पर पीड़नम्’ में अहर्निश लगे रहते हैं। ऐसी अधम वृति के आदमी दूसरों को सताने, मारने, दुःखी करने में आनंद लेते हैं। जहां भी इनका निवास होता है वहां हिंसा, द्वेष, अशान्ति, अत्याचार, अपवित्रता का अखाड़ा रहता है। ऐसे व्यक्तियों का जन्म सत्कर्म क्षय होने के कारण अधम से अधम परिवारों में होता रहता है। मृत्यु के बाद ऐसे लोग एक सीमा पर पिशाच योनि में जन्म लेने हैं। अपने पापों का फल भोग करते हैं। और भी यदि कर्म गिरे हुए हैं तो एसे लोग मनुष्य देही से भी वंचित होकर पशु योनियों में सरक जाते हैं। वहां से उद्धार प्रकृति एवं महाकाल के निश्चित विकास का ही परिणाम हो सकता है।
जो कहा गया है वह उतना ही यथार्थ है जितना यथार्थ यह वर्तमान जीवन है। यदि वर्तमान कालिक चेतना है तो अवर्तमान कालिक चेतना का भी अस्तित्व है। यदि वर्तमान है तो भूत एवं भविष्य भी है। यदि यह चेतना स्वीकार्य है तो वह चेतना भी स्वीकार्य है जो वर्तमान को लांघकर अतीत और भविष्य में संक्रान्त होने वाली भी है।
राजस्थान के हनुमानगढ़ में रहनेवाले सात साल के अवतार ने, न सिर्फ विज्ञान को बल्कि कानून के जानकारों के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी । बच्चे का दावा है कि उसका पुनर्जन्म हुआ है और वो अपने कातिलों को अच्छी तरह जानता है। सात साल पहले बड़ी बेरहमी से उसकी हत्या कर दी गयी थी। उसकी इन बातों से परेशान होकर एक दिन अवतार के पिता चरण सिंह ने फैसला किया कि वो अपने बच्चे को उस जगह लेकर जाएगें, जिस जगह का ज़िक्र वो हमेशा किया करता है।
पंजाब के फिरोजपुर जिले में, अबोहर पहुंचते ही सात साल का अवतार अजीबोगरीब हरक़त करने लगा।  सात साल पहले वो जिन रास्तों से आया-जाया करता था, उसे वो सभी रास्ते बहुत अच्छी तरह याद थे। वो कई लोगों को पहचानने लगा। उसे चौक, घर, दुकानें सभी याद आने लगीं। चरण सिंह एकदम हैरान रह गए जब सात साल के अवतार ने अपने पिता को एक घर के सामने लाकर खड़ा कर दिया और उनको बता दिया यही  उसके  पूर्वजन्म का घर है। उस घर में मौजूद लोगों ने तो अवतार को नहीं पहचाना, लेकिन अवतार ने उन सब  को एक-एक कर पहचान लिया।
ऐसी ही एक घटना महरहा गाँव में 1990 में घटित हुई। इस गांव के डॉ. राकेश शुक्ला के चार वर्षीय बेटे भीम ने एक दिन अचानक ही अपने माता-पिता से यह कहना शुरू कर दिया कि उसका नाम भीम नहीं है और न ही यह उसका घर है। उसके द्वारा रोज-रोज ऐसा कहने पर आखिर माता-पिता को पूछना ही पड़ा, बेटा तुम्हारा नाम भीम नहीं है तो क्या है और तुम्हारा घर यहां नहीं है तो कहां है? इस पर भीम ने जो उत्तर दिया उससे डॉ. शुक्ला आश्चर्यचकित रह गए। भीम ने बताया कि उसका असली नाम-सुक्खू है। वह जाति का चमार है और उसका घर बिन्दकी के पास मुरादपुर गांव में है। उसके परिवार में पत्नी एवं दो बच्चे हैं। बड़े बेटे का नाम उसने मानचंद भी बताया। भीम ने यह भी बताया कि वह खेती-किसानी किया करता था। एक दिन खेत में सिंचाई करते समय उसके चचेरे भाइयों से उसका झगडा हो गया और उसके चचेरे भाइयों ने उसे फावड़े से काटकर मार डाला ।
भीम द्वारा बताया गया गाँव मुरादपुर, महरहा से मात्र तीन-चार किलोमीटर की ही दूरी पर है इसलिए डॉ. शुक्ला ने मुरादपुर जाकर लोगों से सुक्खू चमार और उसके परिजनों के बारे में पूछ-ताछ की और जो जानकारी मिली, भीम द्वारा बतायी गई बातों से पूरी तरह मेल खाती थी।
हमारे ज्ञान की क्षमता बहुत कम है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आगस्टीन ने ठीक ही कहा है, ’हम कभी यह दावा नहीं कर सकते की हमारा ज्ञान निरपेक्ष है।’ हमारा ज्ञान सीमित व सापेक्ष है। आज तक भी इस दुनिया में किसी बडे़ सत्य का उद्घाटन जिन लोगो ने किया है, उन्होंनें तर्क या बुद्धि के क्षेत्र में नहीं किया । जो जैसा भी ज्ञान, भौतिक या आध्यात्मिक, इस जगत में उतरा है वह शून्य या निर्विकल्प स्थिति में उतरा है। विशिष्ट ज्ञान विशिष्ट स्थिति मंे उतरता है।