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Sunday, 10 November 2013

इस्लाम का भविष्य

इस्लाम का भविष्य क्या होगा ?

मुसलमान अक्सर अपनी बढ़ती जनसंख्या की डींगें मारते रहते है .और घमंड से कहते हैं कि आज तो हमारे 53 देश हैं .आगे चलकर इनकी संख्या और बढ़ेगी .इस्लाम दुनिया भर में फ़ैल जायेगा .विश्व ने जितने भी धर्म स्थापक हुए हैं ,सभी ने अपने मत के बढ़ने की कामना की है .लेकिन मुहम्मद एकमात्र व्यक्ति था जिसने इस्लाम के विभाजन ,तुकडे हो जाने और सिमट जाने की पहिले से ही भविष्यवाणी कर दी थी .यह बात सभी प्रमाणिक हदीसों में मौजूद है .
यदि कोई इन हदीसों को झूठ कहता है ,तो उसे मुहम्मद को झूठ साबित करना पड़ेगा .क्योंकि यह इस्लाम के भविष्य के बारे में है .सभी जानते हैं कि किसी आदर्श ,या नैतिकता के आधार पर नहीं बल्कि तलवार के जोर पर और आतंक से फैला है .इस्लाम कि बुनियाद खून से भरी है .और कमजोर है .मुहम्मद यह जानता था .कुरान में साफ लिखा है -

1-इस्लाम की बुनियाद कमजोर है
"कुछ ऐसे मुसलमान हैं ,जिन्होंने मस्जिदें इस लिए बनायीं है ,कि लोगों को नुकसान पहुंचाएं ,और मस्जिदों को कुफ्र करने वालों के लिए घात लगाने और छुपाने का स्थान बनाएं .यह ऐसे लोग हैं ,जिन्होंने अपनी ईमारत (इस्लाम )की बुनियाद किसी खाई के खोखले कगार पर बनायीं है ,जो जल्द ही गिरने के करीब है .फिर जल्द ही यह लोग जहन्नम की आग में गिर जायेंगे "सूरा -अत तौबा 9 :108 और 109

2 -इस्लाम से पहिले विश्व में शांति थी .यद्यपि इस्लाम से पूर्व भी अरब आपस में मारकाट किया करते थे ,लेकिन जब वह मुसलमान बन गए तो और भी हिंसक और उग्र बन गए .जैसे जैसे उनकी संख्या बढ़ती गयी उनका आपसी मनमुटाव और विवाद भी बढ़ाते गए .वे सिर्फ जिहाद में मिलने वाले माल के लिए एकजुट हो जाते थे .फिर किसी न किसी बात पर फिर लड़ने लगते थे ,शिया सुनी विवाद इसका प्रमाण है .

इसके बारे में मुहमद के दामाद हजरत अली ने अपने एक पत्र में मुआविया को जो लिखा है उसका अरबी के साथ हिंदी और अंगरेजी अनुवाद दिया जा रहा है -

3 -हजरत अली का मुआविया को पत्र

हजरत अली का यह पत्र संख्या 64 है उनकी किताब" नहजुल बलाग "में मौजूद है .
http://www.imamalinet.net/EN/nahj/nahj.htm

"यह बात बिलकुल सत्य है कि,इस्लाम से पहिले हम सब एक थे .और अरब में सबके साथ मिल कर शांति से रह रहे थे .तुमने (मुआविया )महसूस किया होगा कि ,जैसे ही इस्लाम का उदय हुआ ,लोगों में फूट और मनमुटाव बढ़ाते गए .इसका कारण यह है ,कि एक तरफ हम लोगों को शांति का सन्देश देते रहे ,और दूसरी तरफ तुम मुनाफिक(Hypocryt )ही बने रहे ,और इस्लाम के नाम पर पाखंड और मनमर्जी चलाते रहे.तुमने अपने पत्र में मुझे तल्हा और जुबैर की हत्या का आरोपी कहा है .मुझे उस पर कोई सफ़ाई देने की जरुरत नहीं है .लेकिन तुमने आयशा के साथ मिलकर मुझे मदीना से कूफा और बसरा जाने पर विवश कर दिया ,तुमने जो भी आरोप लगाये हैं ,निराधार है ,और मैं किसी से भी माफ़ी नहीं मांगूंगा "
मुआविया के पत्र का हजरत अली का मुआविया को जवाब -नहजुल बलाग -पत्र संख्या 64

ومن كتاب له عليه السلام
كتبه إلى معاوية، جواباً عن كتاب منه
أَمَّا بَعْدُ، فَإِنَّا كُنَّا نَحْنُ وَأَنْتُمْ عَلَى مَا ذَكَرْتَ مِنَ الاَُْلْفَةِ وَالْجَمَاعَةِ، فَفَرَّقَ بيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ أَمْسِ أَنَّا آمَنَّا وَكَفَرْتُمْ، وَالْيَوْمَ أَنَّا اسْتَقَمْنَا وَفُتِنْتُمْ، وَمَا أَسْلَمَ مُسْلِمُكُمْ إِلاَّ كَرْهاً وَبَعْدَ أَنْ كَانَ أَنْفُ الاِِْسْلاَمِكُلُّهُ لِرَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وآله حرباً
وَذَكَرْتَ أَنِّي قَتَلْتُ طَلْحَةَ وَالزُّبَيْرَ، وَشَرَّدْتُ بِعَائِشَةَ وَنَزَلْتُ بَيْنَ الْمِصْرَيْنِ وَذلِكَ أَمْرٌ غِبْتَ عَنْهُ، فَلاَ عَلَيْكَ، وَلاَ الْعُذْرُ فِيهِ إِلَيْكَ

[ A reply to Mu'awiya's letter. ]

It is correct as you say that in pre-Islamic days we were united and at peace with each other. But have you realized that dissensions and disunity between us started with the dawn of Islam. The reason was that we accepted and preached Islam and you remained heathen. The condition now is that we are faithful and staunch followers of Islam and you have revolted against it. Even your original acceptance was not sincere, it was simple hypocrisy. When you saw that all the big people of Arabia had embraced Islam and had gathered under the banner of the Holy Prophet (s) you also walked in (after the Fall of Makkah.)

In your letter you have falsely accused me of killing Talha and Zubayr, driving Ummul Mu'minin Aisha from her home at Madina and choosing Kufa and Basra as my residence. Even if all that you say against me is correct you have nothing to do with them, you are not harmed by these incidents and I have not to apologize to you for any of them.

4 -इस्लाम का विभाजन

इस्लाम के पूर्व से ही अरब के लोग दूसरों को लूटने और आपसी शत्रुता के कारण लड़ते रहते थे .लेकिन मुसलमान बन जाने पर उनको लड़ने और हत्याएं करने के लिए धार्मिक आधार मिल गया .वह अक्सर अपने विरोधियों को मुशरिक ,मुनाफिक और काफ़िर तक कहने लगे और खुद को सच्चा मुसलमान बताने लगे .और अपने हरेक कुकर्मों को कुरान की किसी भी आयत या किसी भी हदीस का हवाला देकर जायज बताने लगे .धीमे धीमे सत्ता का विवाद धार्मिक रूप धारण करता गया .मुहम्मद की मौत के बाद ही यह विवाद इतना उग्र हो गया की मुसलमानों ने ही मुहम्मद के दामाद अली ,और उनके पुत्र हसन हुसैन को परिवार सहित क़त्ल कर दिया .उसके बाद ही इस्लाम के टुकडे होना शुरू हो गए .जिसके बारे में खुद मुहम्मद ने भविष्यवाणी की थी .-

"अबू हुरैरा ने कहा कि,रसूल ने कहा था कि यहूदी और ईसाई तो 72 फिरकों में बँट जायेंगे ,लेकिन मेरी उम्मत 73 फिरकों में बँट जाएगी ,और सब आपस में युद्ध करेंगे "अबू दाऊद-जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4579

"अबू अमीर हौजानी ने कहा कि ,रसूल ने मुआविया बिन अबू सुफ़यान के सामने कहा कि ,अहले किताब (यहूदी ,ईसाई ) के 72 फिरके हो जायेंगे ,और मेरी उम्मत के 73 फिरके हो जायेंगे ..और उन में से 72 फिरके बर्बाद हो जायेंगे और जहन्नम में चले जायेंगे .सिर्फ एक ही फिरका बाकी रहेगा ,जो जन्नत में जायेगा "अबू दाऊद -जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4580 .

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,ईमान के 72 से अधिक टुकडे हो जायेंगे ,और मुसलमानों में ऐसी फूट पड़ जाएगी कि वे एक दुसरे कीहत्याएं करेंगे ."
अबू दाऊद -जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4744 .

"अरफजः ने कहा कि मैं ने रसूल से सुना है ,कि इस्लाम में इतना बिगाड़ हो जायेगा कि ,मुसलमान एक दुसरे के दुश्मन बन जायेंगे ,और तलवार लेकर एक दुसरे को क़त्ल करेंगे "अबू दाऊद -जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4153 .

"सईदुल खुदरी और अनस बिन मालिक ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,पाहिले तो मुसलमान इकट्ठे हो जायेंगे ,लेकिन जल्द ही उनमें फूट पड़ जाएगी .जो इतनी उग्र हो जाएगी कि वे जानवरों से बदतर बन जायेगे .फिर केवल वही कौम सुख से जिन्दा रह सकेगी जो इनको इन को ( नकली मुसलमानों )को क़त्ल कर देगी .फिर अनस ने रसूल से उस कौम की निशानी पूछी जो कामयाब होगी .तो रसुलने बताया कि,उस कौम के लोगों के सर मुंडे हुए होंगे .और वे पूरब से आयेंगे "अबू दाऊद-जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4747 .

5 -इस्लाम के प्रमुख फिरके

आमतौर पर लोग मुसलमानों के दो ही फिरकों शिया और सुन्नी के बारे में ही सुनते रहते है ,लेकिन इनमे भी कई फिरके है .इसके आलावा कुछ ऐसे भी फिरके है ,जो इन दौनों से अलग है .इन सभी के विचारों और मान्यताओं में इतना विरोध है की यह एक दूसरे को काफ़िर तक कह देते हैं .और इनकी मस्जिदें जला देते है .और लोगों को क़त्ल कर देते है .शिया लोग तो मुहर्रम के समय सुन्नियों के खलीफाओं ,सहबियों ,और मुहम्मद की पत्नियों आयशा और हफ्शा को खुले आम गलियां देते है .इसे तबर्रा कहा जाता है .इसके बारे में अलग से बताया जायेगा .

सुन्नियों के फिरके -हनफी ,शाफई,मलिकी ,हम्बली ,सूफी ,वहाबी ,देवबंदी ,बरेलवी ,सलफी,अहले हदीस .आदि -

शियाओं के फिरके -इशना अशरी ,जाफरी ,जैदी ,इस्माइली ,बोहरा ,दाऊदी ,खोजा ,द्रुज आदि

अन्य फिरके -अहमदिया ,कादियानी ,खारजी ,कुर्द ,और बहाई अदि

इन सब में इतना अंतर है की ,यह एक दुसरे की मस्जिदों में नमाज नहीं पढ़ते .और एक दुसरे की हदीसों को मानते है .सबके नमाज पढ़ने का तरीका ,अजान ,सब अलग है .इनमे एकता असंभव है .संख्या कम होने के से यह शांत रहते हैं ,लेकिन इन्हें जब भी मौका मिलाता है यह उत्पात जरुर करते हैं .

6 -इस्लाम अपने बिल में घुस जायेगा

मुहम्मद ने खुद ही इस्लाम की तुलना एक विषैले नाग से की है .इसमे कोई दो राय नहीं है .सब जानते हैं कि यह इस्लामी जहरीला नाग कितने देशों को डस चुका है .और भारत कि तरफ भी अपना फन फैलाकर फुसकार रहा है .लेकिन हम हिन्दू इतने मुर्ख हैं कि सेकुलरिज्म ,के नामपर ,और झूठे भाईचारे के बहाने इस इस्लामी नाग को दूध पिला रहे हैं .और तुष्टिकरण की नीतियों को अपना कर आराम से सो रहे है .आज इस बात की जरुरत है की ,हम सब मिल कर मुहम्मद की इस भविष्यवाणी को सच्चा साबित करदें ,जो उसने इन हदीसों में की थीं .-

"अबू हुरैरा ने कहा की ,रसूल ने कहा कि,निश्चय ही एक दिन इस्लाम सारे विश्व से निकल कर कर मदीना में में सिमट जायेगा .जैसे एक सांप घूमफिर कर वापिस अपने बिल में घुस जाता है 'बुखारी -जिल्द 3 किताब 30 हदीस 100 .

"अब्दुल्ला बिन अम्र बिन यासर ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,जल्द ही एक ऐसा समत आयेगा कि जब लोग कुरान तो पढेंगे ,लेकिन कुरान उनके गले से आगे कंधे से निचे नहीं उतरेगी.और इस्लाम का कहीं कोई निशान नहीं दिखाई देगा "

बुखारी -जिल्द 9 किताब 84 हदीस 65

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने कहा है कि ,इस्लाम सिर्फ दो मस्जिदों (मक्का और मदीना )के बीच इस तरह से रेंगता रहेगा जैसे कोई सांप इधर उधर दो बिलों के बीच में रेंगता है "

सही मुस्लिम -किताब 1 हदीस 270 .

"इब्ने उमर ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ऐसा निकट भविष्य में होना निश्चय है ,कि इस्लाम और ईमान दुनिया से निकलकर वापस मदीने में इस तरह से घुस जायेगा ,जैसे कोई विषैला सांप मुड़कर अपने ही बिल में घुस जाता है "

सही मुस्लिम -किताब 1 हदीस 271 और 272 .

अब हम देखते हैं कि मुसलमान इन हदीसों को झूठ कैसे साबित करते है . आज लीबिया ,यमन और दूसरे इस्लामी देशों में जो कुछ हो रहा है ,उसे देखते हुए यही प्रतीत होता है कि मुहम्मद साहिब की यह हदीसें एक दिन सच हो जायेगीं ,जिनमे इस्लाम के पतन और विखंडन की भविष्यवाणी की गयी है .!


http://www.faithfreedom.org/oped/AbulKasen50920.htm

महिलाओं के लिए नर्क से भी बदतर है सऊदी अरब !

महिलाओं के अधिकारों के प्रति सऊदी अरब हमेशा से ही कट्टर रहा है। लेकिन पिछले हफ्ते वहां महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा और अन्य दुर्व्‍यवहार पर प्रतिबंध लगाने के एक उद्देश्‍य से एक कानून लागू किया गया। महिलाओं के रहने के लिहाज से सबसे ज्यादा खराब देश में यह कानून एक बड़ा बदलाव हो सकता है। लेकिन वाकई सऊदी महिलाएं पुरुष साथी के खिलाफ घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज करा सकेंगी, इस बारे में अभी भी कुछ कहना मुश्किल है। यह कानून उनके देश में मुक्ति का पहला कदम ही है। अभी भी यहां सिर्फ 10 साल की उम्र में बच्चियों की शादी करा देने और बलात्कार पर बेवकूफी भरा कानून अस्तित्व में हैं। कुछ ऐसे ही कानूनों के बारे में आगे पढ़ें...
पुरुष सत्तात्मक समाज
४० साल के ऊपर की फातिमा रियाद में रहती है। वह तब तक प्लेन में बैठ नहीं सकती, जब तक उसके पास अपने बेटे द्वारा लिखित अनुमति नहीं होगी।  रूढ़िवादी सऊदी अरब में महिला का अपना कोई जीवन नहीं होता। कानूनी रूप बालिग होने बावजूद भी महिलाओं का कोई अस्तित्व नहीं है। सऊदी में प्रत्येक महिला का पुरुष अभिभावक होना चाहिए। इसमें उसके पिता से लेकर अंकल, भाई, बेटे होते हैं।
किसी भी सऊदी महिला को पढ़ाई, काम, यात्रा, शादी और यहां तक चिकित्सीय जांच के लिए भी पुरुषों से लिखित अनुमति लेनी पड़ती है। इसके अलावा बिना किसी भी पुरुष अभिभावक वे केस फाइल नहीं कर सकती और न्याय की बात तो भूल ही जाइए।
बाल-विवाह
१२ साल की फातिमा को उसके पिता ने ५० साल अधेड़ आदमी को शादी के लिए बेच दिया। इस आदमी की पहले से ही बीवी और १० बच्चे थे। फातिमा उसके चंगुल से छूटने में सफल रही और अंतत: उसने फरवरी २०१३ में तलाक ले लिया। एक मानवाधिकार संगठन ने उसका केस लड़ा था। सऊदी अरब में छोटी सी उम्र में ही लड़कियों को बेच कर उनकी शादी ७०-८० साल के पुरुषों से कराने का चलन है। रियाद स्थित इमाम मोहम्मद बिन सऊद इस्लामिक यूनिवर्सिटी के प्रो. ग्रांड मुफ्ती शेख अब्दुल अजीज अल शेख का मानना है कि लड़किया १० से १२ साल की उम्र में शादी के लिए तैयार हो जाती हैं। २५ साल की उम्र में शादी करने वाली लड़कियां सबसे बड़ी गलती करती हैं। हाल के सालों में मुल्क में शादी के लिए उम्र बढ़ाने को लेकर काफी दबाव बन रहा है।
बलात्कार का कानून
साल २००७ की बात थी। सऊदी अरब की एक कोर्ट ने गैंगरेप की शिकार पीड़ित को छह महीने कैद और २०० कोड़े मारने का आदेश सुनाया था। इसके अलावा उसे ९० कोड़े मारने की सजा भी अलग से इसलिए सुनाई गई, क्योंकि वह कार में  पराए मर्द के साथ थी। इसमें भी महिला को ही दोषी माना गया।
यहां लड़कियों को बालिग होने से पहले ही शादी करा दी जाती है और उन्हें हिजाब में रहना पड़ता है। बावजूद इसके यहां रेप की संख्या सबसे ज्यादा है। इसका जिम्मेदार बलात्कार के कानून को माना जाता है। हालांकि सऊदी में शरिया कानून में रेप के लिए सजा का प्रावधान है। पत्नी के साथ रेप को अपराध नहीं माना जाता है। बलात्कार के लिए किसी आरोपी को तब तक सजा नहीं दी जा सकती जब तक उसके चार प्रत्यक्षदर्शी न हों।
विदेशी महिला कामगारों के लिए देश में कोई कानून नहीं हैं। इसलिए उनके साथ सबसे ज्यादा ज्यादती की जाती है। इसके अलावा रेप की रिपोर्टिग करना प्रतिबंधित है। महिला के पराए मर्द के साथ रिश्ते रखने पर मर्द से कुछ नहीं कहा जाता है। महिला को इसके लिए उचित सजा का प्रावधान है।
शिक्षा पर पाबंदीयां
२०११ की बात है। महत्वकांक्षी सुसान अली अल देमिनी अमेरिका में पढ़ाई करना चाहती थी। सुसान के इस फैसले को उनके पिता का सपोर्ट था, लेकिन वह दाखिला नहीं ले सकी। सऊदी अरब की हायर एजुकेशन कानून के मुताबिक सरकारी स्कॉलरशिप पर विदेश में पढ़ाई करने के दौरान लड़की के साथ पुरुष अभिभावक का होना ज़रूरी है। जबकि सुसान के साथ उनके माता-पिता दोनों ही जाने को तैयार थे, लेकिन उनके पिता को देश से बाहर जाने से रोक दिया गया और नियमों के मुताबिक मां का जाना गैरकानूनी था।
सऊदी अरब में एजुकेशन सिस्टम लैंगिक भेदवाव पर आधारित है। पुरुषों के मुताबिक महिलाओं को कम सुविधाएं मुहैया करवाई जाती हैं। सऊदी ऑफिशियल पॉलिसी के मुताबिक, वहां लड़कियों को केवल इसलिए पढ़ाया जाता है ताकि वे पारंपरिक इस्लामिक ढंग से अपनी जिम्मेदारियां निभा सकें। बीमारी की हालत में भी लड़कियां संस्थान कैंपस तब तक नहीं छोड़ सकती हैं, जब तक पुरुष अभिभावक की इजाजत ना हो।
नौकरी पर पाबंदीयां
मनर सऊद ने इस साल मई में विनचेस्टर यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री ऑग्रेनाइजेशनल लीडरशिप में हासिल की थी। उन्हें सऊदी सरकार की ओर से स्कॉलरशिप मिली। बावजूद इसके उसके पास कोई नौकरी नहीं हैं। सऊदी सरकार महिलाओं की शिक्षा के लिए काफी पैसे खर्च करती है। लेकिन उनकी नौकरी की कोई व्यवस्था नहीं की जाती है। ५७ फीसदी महिलाओं के पास यूनिवर्सिटी की डिग्री है। ७८ फीसदी के पास स्नातक और ६० फीसदी पीएचडी डिग्री वाली महिलाएं बेरोजगार हैं। दरअसल, सऊदी अरब पुरुष साथी के साथ काम करने, साक्षात्कारों से बचने के लिए नौकरी नहीं दी जाती है।
परिणाम स्वरूप सऊदी महिला पुरुषों के मुकाबले ज्यादा पढ़ी लिखी हैं। २००९ में महिला ग्रेजुएट की संख्या ५९,९४८ थी, जबकि ५५, ८४२ पुरुष ग्रेजुएट थे।
कार चलाने पर पाबंदी
२००८ में वाजेहा अल-हुवैदर का नाम दुनिया में मशहूर हो गया। वह सऊदी अरब की पहली महिला थी, जिसने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर खुद के कार चलाने का वीडियो यूटच्यूब पर पोस्ट किया था। सऊदी अरब में महिलाओं के कार चलाने पर पाबंदी है।
पांच साल बाद अब थोड़ा परिवर्तन आया है। महिलाओं को प्राइवेट ड्राइवर और पुरुष रिश्तेदार के निगरानी में कार चलाने की इजाजत दी जा चुकी है। कई बार पुलिस महिलाओं को गाड़ी चलाते हुए रोक लेती है और उनसे शपथ पत्र लिखवाती हैं कि वह कभी गाड़ी नहीं चलाएंगी। कई बार उन्हें कोड़े मारने की सजा भी दी जाती है। अप्रैल में सऊदी अरब ने महिलाओं के साइकिल और मोटरसाइकिल न चलाने के कानून पर पाबंदी हटा ली है।
खेलों और जिम पर पाबंदी
पिछले साल लंदन ओलिंपिक में दो सऊदी महिला एथलीटों को अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति के दबाव में भेजना पड़ा। इससे पहले सऊदी अरब पुरुष खिलाड़ियों को ही भेजता था। हालांकि फीमेल एथलीटों का प्रसारण सऊदी टीवी पर नहीं किया गया था। सऊदी लड़कियों को खेलों और जिम जाने देने की इजाजत नहीं है। प्रिंसेस नोरा बिंत अब्दुल रहमान यूनिवर्सिटी महिलाओं की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी है, जिसमें स्वीमिंग पूल, टेनिस कोर्ट और एक्सरसाइज एरिए की सुविधा है। इसके अलावा कोई भी यूनिवर्सिटी ऐसा सुविधा नहीं देती।
फीमेल एथलीट किसी भी स्पोर्ट्स क्लब में रजिस्टर नहीं करा सकती। नेशनल ट्रायल में उनके लिए पाबंदी है। मई २०१३ में शरिया कानून और ड्रेसकोड के साथ प्राइवेट स्कूल में स्पोर्ट्स एक्टिविटी की इजाजत दी गई है।
कुछ ऐसे कानून
अरब क्रांति के बाद किंग अब्दुला ने कुछ कानून में सुधार किया है। इसमें महिलाओं के अधिकार ज्यादा हैं।  उन्होंने २०१५ के म्युनिसिल चुनावों में फीमेल वोटिंग को इजाजत दी है। जनवरी में उन्होंने पहली महिला सदस्य को सलाहकार परिषद में जगह दी है। वहीं, १५० सदस्यों वाली एडवायजरी बॉडी में ३० महिला शामिल हैं। २००९ में पहला एकीकृत कोएड यूनिवर्सिटी और देश की पहली महिला मंत्री नियुक्त की गई थीं। महिलाएं अब अंत:वस्त्र और मेकअप शॉप, सुपर मार्केट और रेस्त्रा काम कर सकती हैं।

Friday, 30 August 2013

इस्लाम और गिलमा(हिजडा)


कुरान में मुसलमानों से वादा किया गया है कि मरने के बाद उनको जन्नत में कुंवारी और सुन्दर हूरें दी जाएँगी .और साथ में सुन्दर अल्पायु के लडके भी दिए जायेंगे जिन्हें "गिलमा " कहा जाता .क्योंकि मुसलमान लड़कों के भी शौक़ीन होते हैं .वह जन्नत में जाये बिना ही यहीं अपनी इच्छा पूरी करते आये हैं .इसी के बारे में जानकारी दी जा रही है .

यदि कोई व्यक्ति दुर्भावना रहित निष्पक्ष रूप से इस्लामी साहित्य ,मुस्लिम शासकों का इतिहास और मुसलमानों आचार विचार का गंभीर अध्यन करने पर आसानी से इस बात का निष्कर्ष निकला जा सकता ,कि है हरेक कुकर्म और अपराध का सम्बन्ध इसी गलत धार्मिक शिक्षा से है .ऐसा ही एक दुर्गुण है जो इस्लाम के साथ ही सम्पूर्ण विश्व में फ़ैल गया है ,जिसको समलैंगिकता (Homo sexuality ) भी कहते हैं .और दूसरा दुर्गुण अफगानिस्तान ,पाकिस्तान और में मौजूद है जिसे "बच्चा बाजी " कहा जाता है .इसी तरह भारत में हिजड़ों कि प्रथा भी मुस्लिम शासक ही लाये थे .जिनको"मुखन्निस(Arabic مخنثون "effeminate ones")कहते हैं .यह ऐसे लडके या पुरुष होते हैं ,जिनका पुरुषांग काट दिया जाता ताकि वह स्त्री जैसे दिखें .और जब वह हरम में काम करें तो वहां की औरतोंसे कोई शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना सकें .समलैंगिकता इस्लाम से पूर्व और इस्लाम के बाद भी किसी न किसी रूप से मुस्लिम देशों में मौजूद है .इसके लिए हमें कुरान ,हदीस और इतिहास का सहारा लेना जरुरी है .देखिये -

1-इस्लाम से पूर्व समलैगिकता 

इस्लाम से पहिले अरब के लोग सुन्दर लड़कों के साथ कुकर्म करते थे ,यह खुद कुरान से साबित होता है ,जो कहती है 
"जब हमारे फ़रिश्ते लड़कों के रूप में लूत( एक नबी ) के पास गए ,तो वह उन लड़कों के बारे में चिंतित हो गया .और खुद को बेबस समझाने लगा ,क्योंकि उसकी जाति लोग लडके देखते ही उसके घर की तरफ दौड़े आ रहे थे .क्योंकि वह लोग हनेशा से ऐसा कुकर्म करते रहते थे .लूत ने उन से कहा हे लोगो यह मेरी बेटियां हैं जो लड़कों से अधिक उपयोगी हैं और बिलकुल पाक हैं ,तुम लड़कों से साथ कुकर्म करके मुझे लज्जित नहीं करो .क्या तुम में कोई भला आदमी नहीं है ,वह बोले हमें तेरी बेटियों से कोई मतलब नहीं .तुम तो जानते हो की हमारा असली इरादा क्या है " 
सूरा -हूद 11 :77 से 79 
"लूत ने कहा तुम अपनी कम वासना की पूर्ति के लिए लड़कियों को छोड़कर लड़कों के पास जाते हो "सूरा-अल आराफ़ 7 :80 


2-जन्नत में लडके मिलेंगे 

आपको यह बात जरुर अजीब लगेगी कि एक तरफ कुरान लड़कों के साथ दुराचार को बुरा कहती है ,और दूसरी तरफ लोगों को जन्नत में सुन्दर लडके मिलने का प्रलोभन देती है .जन्नत के इन लड़को को "गिलामाغِلمانُ " कहा गया है .कुरान में इनका ऐसा वर्णन है .
" और उनके चारों तरफ लड़के घूम रहे होंगे ,वह ऐसे सुन्दर हैं ,जैसे छुपे हुए मोती हों "सूरा -अत तूर 52 :24 
"وَيَطُوفُ عَلَيْهِمْ غِلْمَانٌ لَّهُمْ كَأَنَّهُمْ لُؤْلُؤٌ مَّكْنُونٌ" 52:24
"वहां ऐसे किशोर फिर रहे होंगे जिनकी आयु सदा एक सी रहेगी (immortal youths ) सूरा -अल वाकिया 56 :17 
इन लड़कों की हकीकत कुरान की इस आयत से पता चलती है ,जो कहती है कि,
"ऐसे पुरुष जो औरतों के लिए अशक्त हों (who lack vigour ) सूरा -नूर 24 :31 
बोलचाल की भाषा में हम ऐसे पुरुषों नपुंसक या हिजड़ा (Eunuchs ) कहते हैं . मुस्लिम शासक कई कई औरते रखते थे ,और हरम की रक्षा के लिए हिजड़े रखते थे .जिन्हें "खोजा सरा" कहा जाता था .रसूल की हरम में भी कई औरतें थी .इसके लिए हिजड़ों की जरूरत होती थी .यह बात इन हदीसों से पता चलती है .सभी प्रमाणिक हदीसें हैं .
3-रसूल हिजड़े रखते थे .
अपने हरमों में हिजड़ों को रखना इस्लाम की पुरानी परंपरा है .और रसूल के घर में भी हिजड़े रहते थे ,और कभी रसूल खुद हिजड़े खरीदते थे ,जो इन हदीसों और सीरत से पता चलता है ,
"अमीरुल मोमिनीन आयशा ने कहा कि एक हिजड़ा रसूल के पास आता था .और एक दिन जब रसूल घर में घुसे तो उनकी पत्नियाँ औरतों के बारे में चर्चा कर रही थी .कि जब औरत आगे बढाती है तो चार गुनी और पीछे चलती है तो उनका पेट आठ गुना निकलता है .रसूल बोले मुझे इस बात पर विश्वास नहीं ,शायद यह हिजड़ा अधिक जानता हो . तब औरतों ने उस हिजड़े से पर्दा कर लिया .
Narrated Aisha, Ummul Mu'minin: A mukhannath (eunuch) used to enter upon the wives of Prophet . They (the people) counted him among those who were free of physical needs. One day the Prophet entered upon us when he was with one of his wives, and was describing the qualities of a woman, saying: When she comes forward, she comes forward with four (folds in her stomach), and when she goes backward, she goes backward with eight (folds in her stomach). The Prophet  said: Do I not see that this (man) knows what here lies. Then they (the wives) observed veil from him. 
Sunan Abu-Dawud, Book 32, Number 4095: 
4-रसूल ने हिजड़ा ख़रीदा 

अरब में इस्लामी कल में गुलामों का बाजार लगता था ,और एक दिन जब रसूल गुलाम खरीदने गए तो उन्हें एक हिजड़ा मिला जिस का वर्णन सीरत ( मुहम्मद की जीवनी ) में इस तरह मिलता है 
"एक बार रसूल बाजार गए तो उनको वहां "जाहिर "(एक हिजड़ा ) मिल गया ,जिसे रसूल पसंद करते थे .तभी रसूल ने जाहिर को पीछे से आकार पकड़ लिया .जाहिर बोला मुझे छोडो ,तुम कौन हो ,रसूल बोले मैं गुलामों का व्यापारी हूँ ,यानि गुलाम खरीदने वाला हूँ .जब जाहिर को पता चला कि यह रसूल हैं ,तो वह रसूल कि छाती से और जोर से चिपट गया "
One day, Muhammad went to the market, there he found Zahir, whom he liked, so he hugged him from behind. Zahir said: let go of me, who are you? Muhammad told him: I'm the slave trader (literally, I'm the one who buys the slaves), and refused to let go of him so when Zahir knew it was Muhammad, he drew (stuck) his back closer to Muhammad's chest.


فى يوم خرج محمد إلى السوق فوجد زاهرا وكان يحبه فأحتضنه من الخلف 
فقال له زاهر اطلقنى من انت؟ فقال له محمد انا من يشترى العبيد ورفض ان 
يطلقه فلما عرف زاهر أنه محمد صار يمكن ظهره من صدر محمد 
السيرة الحلبية ج 3 ص 441 وفتحي رضوان في (الثائر الأعظم) ص 140 
Al Seera Al Halabya (Muhammad's Biography) by Al Halabya, volume 3, p. 441 and Fathy Rdwan in his book Al Tha'er al A'azam (The greatest rebel)


5-गुलाम लड़कों का काम

गुलाम लड़कों (slave boys ) यानी गिलमा से कई तरह के काम कराये जाते है ,जिनमे एक के बारे में इस हदीस में लिखा है ,
"अनस बिन मलिक ने कहा कि जब भी रसूल शौच के लिए जाते थे ,तो मैं उनके साथ रहता था .और मदद के लिए एक लड़का पानी से भरा बर्तन रखता था .ताकि वह पानी से रसूल के गुप्त अंगों को धो सके "
"وروى أنس بن مالك :
كلما رسول الله ذهب للرد على المكالمة من الطبيعة، وأنا مع صبي آخر يستخدم لمرافقته مع بهلوان كامل من الماء. (وعلق هشام "، حتى انه قد غسل فرجه معها".)
Narrated Anas bin Malik: 
Whenever Allah's Apostle went to answer the call of nature, I along with another boy used to accompany him with a tumbler full of water. (Hisham commented, "So that he might wash his private parts with it.") 
(Sahih Al-Bukhari, Volume 1, Book 4, Number 152; see also Numbers 153-154


6-बच्चा बाजी 


बच्चा बाजी(Pederasty) ,यह इस्लाम का एक मनोरजन है ,इसमे छोटे छोटे लड़कों या तो खरीद कर या अगवा करके उठाव लिया जाता है .फिर उनको लड़कियों के कपडे पहिना कर नाच कराया जाता है .और नाच के बाद उनके साथ कुकर्म किया जाता है .कभी कभी ऐसे लड़कों को खस्सी करके (Castrated ) हिजड़ा बना दिया जाता है .यह इस्लामी परम्परा अफगानिस्तान ,सरहदी पाकिस्तान में अधिक है .इस कुकर्म के लिए 9 से 14 साल के लड़को को लिया जाता है .अफगानिस्तान में गरीबी और अशिक्षा अधिक होने के कारण वह आदर्श इस्लामी देश है .इसलिए वहां बच्चा बाजी एक जायज मनोरंजन है .विकी पीडिया में इसका पूरा हवाला मिल सकता है ,इसकी लिंक दी जा रही है .
अधिक जानकारी के लिए यू ट्यूब से एक लिंक दी जा रही है ,
Homosexual Pedophilia in Afghanistan: Bacha Bazi

7-मुस्लिम शासकों ने हिजड़े बनाये 
अरब लोगों में गिलमा यानी Salve Boys रखने की पहुत पुरानी परम्परा है .इसे इज्जतदार होने की निशानी समझा जाता था .अमीर उन गिलमा लड़कों के साथ कुकर्म किया करते थे .कुरान में गिलमा के बारे में सुन्दर लडके कहा गया है .लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि गिलमा लडके हिजड़े होते हैं ,जिन्हें कम आयु में ही Castrated करके हिजड़ा बना दिया जाता है .इसके बारे में प्रमाणिक और विस्तृत जानकारी खलीफा अल रशीद और खलीफा अल अमीन के इतिहास से मिलती है .जिसे सन 1948 में लन्दन से प्रकाशित किया गया था किताब का नाम "Hitti PK (1948) The Arabs : A Short History, Macmillan, London, p. 99उसी से यह अंश लिए जा रहे हैं .दसवीं सदी ने खलीफा अल मुकतदिर (908 -937 ) ने बगदाद में अपने हरम में रखने के लिए 11 हजार लड़कों को हिजड़ा बनवाया ,जिनमे 7 हजार हब्शी और 4 हजार लडके ईसाई थे .( पेज 174 -175 ) इसका एक उद्देश्य तो उनके साथ कुकर्म करना था .और दूसरा उदेश्य पराजित लोगों को अपमानित करना भी था .
बाद में यही काम भारत में आनेवाले हमलावर मुस्लिम शासकों ने भी किया ,जैसे जब बख्तियार खिलजी ने बंगाल पर हमला किया था ,तो उसने बड़े पैमाने पर 8 से 10 साल के हिन्दू बच्चों को हिजड़ा बना दिया था .बाद में मुगलों कि हुकूमत में (1526 -1799 ) में भी हिजड़े बनाए जाते रहे .इसका वर्णन "आईने अकबरी : में भी मिलता है .इसमे लिखा है अकबर ने 1659 में करीब 22 हजार राजपूत बच्चों को हिजड़ा बनवाया .बाद में जहाँगीर ने और औरंगजेब ने भी इस परंपरा को चालू रखा .ताकि हिन्दू वंशहीन हो जाएँ .इस से पहले सुल्तान अला उद्दीन खिलजी ने 50 हजार और मुहम्मद तुगकक ने 20 हजार और इतने ही फिरिज तुगलक ने भी हिजड़े बनवाये थे .
यहांतक कुछ ऐसे भी हिजड़े थे जो दिल्ली के बादशाह के सेनापति भी बने ,जैसे अल उद्दीन का सेनापति "मालिक काफूर " हिजड़ा था .और कुतुबुद्दीन का सेनापति "खुसरू खान " भी हिजड़ा ही था .महमूद गजनवी और उसके हिजड़े गुलाम के "गिलमा बाजी" (homo sexual ) प्रेम यानि कुकर्म (Sodomy ) को इकबाल जैसे शायर ने भी आदर्श बताया है .क्योंकि यह कुरान और इस्लाम के अनुकूल है .(नोट -लेख का अंतिम भाग सारांश रूप में है ,पूरा विवरण अंग्रेजी में दी गयी साईट में देखें )
भारत सभी देशभक्त और धर्मप्रेमी लोगों से अनुरोध है कि ,किसी प्रकार के झूठे प्रचार में नहीं फंसें .इस्लाम को ठीक से समझें .आने वाले खतरों से सचेत होकर देश धर्म की रक्षा के लिए कटिबद्ध हो .और जिनको किसी ने हिजड़ा बना दिया हो वह हमें क्षमा करें 

Wednesday, 21 August 2013

786


क्या आप जानते हैं कि...... मुस्लिमों द्वारा प्रयुक्त किया जाने वाला अंक 786  क्या है...???


मुस्लिम तथा इस्लाम के पुरोधा 786 अंक को विस्मिल्लाह का रूप बताते हैं.... और, सीधे सीधे इस अंक को अपने अल्लाह से जोड़ते हैं...!

परन्तु आप यह जान कर हैरान हो जायेंगे कि .... इस्लाम का 786 और कुछ नहीं .... बल्कि.... हम हिन्दुओं तथा विश्व का पहला एवं पवित्रम अक्षर ॐ है...!

दरअसल  ऐसा इसीलिए है कि....... मुस्लिमों द्वारा अपने अराध्य के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द ""अल्लाह"" भी..... हिन्दुओं के वेद से ही  चुराया  गया है.... और, जो ""अल्ला"" का अपभ्रंश रूप है..... जिसका अर्थ ""अम्बा, अक्का, अथवा शक्ति होता है"...! 

तो.... उन्होंने  एक काल्पनिक अल्लाह बना लिया ..... और, वैदिक रीति के अनुसार ही दिन में 5  बार उनकी पूजा(आराधना) सुनिश्चित कर ली........  परन्तु , ""ओंकार"" के उच्चारण के बिना उन्हें अपने हर किये धरे पर पानी फिरता नजर आया..... क्योंकि उन्हें भी यह मालूम था कि.... ॐ ही साश्वत   है..... और,  अंतिम सत्य है...!

अपनी इस्लाम की इस  विसंगति को दूर करने लिए..... उन्हें भी ॐ सरीखा ही कोई ""अदभुत और सर्वशक्तिमान"" अक्षर चाहिए था.... जो कि उन्हें नहीं मिला.... क्योंकि, पूरे ब्रह्माण्ड में ॐ एक ही है...!

इसीलिए उन्होंने..... लाचार होकर हमारे 
""अदभुत और सर्वशक्तिमान"" अक्षर ॐ को ही अपना लिया...... परन्तु, उन्होंने  ॐ के तीनों भागों को थोडा दूर दूर लिखा (उल्टा कर लिखा .... क्योंकि, अरबी और इस्लाम में सब चीज उल्टा कर ही लिखा जाता है).... जिससे कि..... यह  एक अंक ७८६ सरीखा दिखने लगा , जिसे उन्होंने जस के तस अपना लिया......!

इस तरह ...... हम निर्विवाद रूप से यह साबित कर सकते हैं कि........ इस्लाम की पूजा (नमाज) पद्धति, उनका अल्लाह ..... यहाँ तक कि उनका पवित्रतम अंक 786 हमारे वेदों से ही चुरा कर बनाया गया है...... और, इस्लाम कोई नया धर्म अथवा संप्रदाय नहीं है...!

इन सब बातों से..... एक महत्वपूर्ण बात यह भी साबित होती है कि..... इस पूरे ब्रह्माण्ड में हिन्दू सनातन धर्म के अलावा और किसी  दूसरे धर्म अथवा संप्रदाय का कोई अस्तित्व  नहीं है..... और, सारे के सारे धर्म तथा  संप्रदाय ........ हमारे हिन्दू सनातन धर्म से चोरी कर..... अथवा, प्रेरणा लेकर तैयार किये गए हैं....!


यही कारण है कि..... सारे दुनिया के विभिन्न  सम्प्रदायों द्वारा ... लाख प्रयास करने के बावजूद भी..... आज तक कोई हमारे हिन्दू सनातन धर्म का बाल भी बांका  नहीं कर पाया है..... और, हम आज भी दुनिया में ....... सबसे सम्मानित तथा आदरणीय धर्म की संज्ञा पाते हैं....!

हमारा हिन्दू सनातन धर्म ही ..... ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति   के साथ  बना है..... और, यही.... अंत तक.... तथा , इसी गौरव के साथ विद्यमान रहेगा...!

बाकी के सारे धर्म धर्म और संप्रदाय.... पानी के बुलबुले की तरह आए हैं..... और, उसी प्रकार विलुप्त भी हो जायेंगे...!

इसीलिए..... गर्व करें कि हम सनातनी हैं ... और , सर्वश्रेष्ठ  हिन्दू धर्म का हिस्सा हैं....!
 

Friday, 16 August 2013

करबला और ब्राह्मण

यह एक सर्वमान्य सत्य है कि इतिहास को दोहराया नहीं जा सकता है और न बदलाया जा सकता है ,क्योंकि इतिहास कि घटनाएँ सदा के लिए अमिट हो जाती है .लेकिन यह भी सत्य है कि विज्ञान कि तरह इतिहास भी एक शोध का विषय होता है .क्योंकि इतिहास के पन्नों में कई ऐसे तथ्य दबे रह जाते हैं ,जिनके बारे में काफी समय के बाद पता चलता है .ऐसी ही एक ऐतिहासिक घटना हजरत इमाम हुसैन के बारे में है वैसे तो सब जानते हैं कि इमाम हुसैन मुहम्मद साहिब के छोटे नवासे ,हहरत अली और फातिमा के पुत्र थे .और किसी परिचय के मुहताज नहीं हैं ,उनकी शहादत के बारे में हजारों किताबें मिल जाएँगी 
एक उर्दू पुस्तक "हमारे हैं हुसैन "जो सन 1960 यानि मुहर्रम 1381 हि० को इमामिया मिशन लखनौउसे प्रकाशित हुई थी.इसकी प्रकाशन संख्या 351 और लेखक "सय्यद इब्न हुसैन नकवी " है .इसी पुस्तक के पेज 11 से 13 तक से कुछ अंश लेकर ,उर्दू से नकवी जी के शब्दों को ज्यों का त्यों दिया जा रहा , जिस से पता चलता है कि इमाम हुसैन ने भारत आने क़ी इच्छा प्रकट क़ी थी 

नकवी जी ने लिखा है "हजरत इमाम हुसैन दुनियाए इंसानियत में मुहसिने आजम हैं,उन्होंने तेरह सौ साल पहले अपनी खुश्क जुबान से ,जो तिन रोज से बगैर पानी में तड़प रही थी ,अपने पुर नूर दहन से से इब्ने साद से कहा था 

"अगर तू मेरे दीगर शरायत को तस्लीम न करे तो , कम अज कम मुझे इस बात की इजाजत दे दे ,कि मैं ईराक छोड़कर हिंदुस्तान चला जाऊं"

नकवी आगे लिखते हैं ,"अब यह बात कहने कि जरुरत नहीं है कि ,जिस वक्त इमाम हुसैन ने हिंदुस्तान तशरीफ लाने की तमन्ना का इजहार किया था ,उस वक्त न तो हिंदुस्तान में कोई मस्जिद थी ,और न हिंदुस्तान में मुसलमान आबाद थे .गौर करने की बात यह है कि,इमाम हुसैन को हिंदुस्तान की हवाओं में मुहब्बत की कौन सी खुशबु महसूस हुई थी ,कि उन्होंने यह नहीं कहा कि मुझे चीन जाने दो ,या मुझे ईरान कि तरफ कूच करने दो ..उन्होंने खुसूसियत से सिर्फ हिंदुस्तान कोही याद किया था 


गालिबन यह माना जाता है कि हजरत इमाम हुसैन के बारे में हिन्दुस्तान में खबर देने वाला शाह तैमुर था .लेकिन तारीख से इंकार करना नामुमकिन है .इसलिए कहना ही पड़ता है कि इस से बहुत पहले ही " हुसैनी ब्राह्मण " द्त्त ब्रह्मिन इमाम हुसैन के मसायब बयाँ करके रोया करते थे .और आज भी हिंदुस्तान में उनकी कोई कमी नहीं है .यही नहीं जयपुर के कुतुबखाने में वह ख़त भी मौजूद है जो ,जैनुल अबिदीन कि तरफ से हिन्दुतान रवाना किया गया था .



इमाम हुसैन ने जैसा कहा था कि ,मुझे हिंदुस्तान जाने दो ,अगर वह भारत की जमीन पर तशरीफ ले आते तो ,हम कह नहीं सकते कि उस वक्त कि हिन्दू कौम उनकी क्या खिदमत करती"

प्रसिद्ध इतिहासकार राज कुमार अस्थाना ने अपने शोधग्रंथ "Ancient India " में लिखा है कि सम्राट यज्देगर्द की तीन पुत्रियाँ थी ,जिनके नाम मेहर बानो , शेहर बानो , और किश्वर बानो थे .यज्देगर्द ने अपनी बड़ी पुत्री की शादी भारत के राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय से करावा दी थी .जिसकी राजधानी उज्जैन थी ..और राजा के सेनापति का नाम भूरिया दत्तथा .जिसका एक भाई रिखब दत्त व्यापर करता था . .यह लोग कृपा चार्य के वंशज कहाए जाते हैं .चन्द्रगुप्त ने मेहर बानो का नाम चंद्रलेखा रख दिया था .क्योंकि मेहर का अर्थ चन्द्रमा होता है ..राजाके मेहर बानो से एक पुत्र समुद्रगुप्त पैदा हुआ .यह सारी घटनाएँ छटवीं शताब्दी की हैं


. यज्देगर्द ने दूसरी पुत्री शेहर बानो की शादी इमाम हुसैन से करवाई थी . और उस से जो पुत्र हुआ था उसका नाम "जैनुल आबिदीन " रखा गया .इस तरह समुद्रगुप्त और जैनुल अबिदीन मौसेरे भाई थे .इस बात की पुष्टि "अब्दुल लतीफ़ बगदादी (1162 -1231 ) ने अपनी किताब "तुहफतुल अलबाब " में भी की है .और जिसका हवाला शिशिर कुमार मित्र ने अपनी किताब "Vision of India " में भी किया है .

इमाम हुसैन के पिता हजरत अली चौथे खलीफा थे . और उस समय वह इराक के शहर कूफा में रहते थे . हजरत prm अली सभी प्रकार के लोगों से प्रेमपूर्वक वर्ताव करते थे . उन के कल में कुछ हिन्दू भी वहां रहते थे .लेकिन किसी पर भी इस्लाम कबूल करने पर दबाव नहीं डाला जाता था .ऐसा एक परिवार रिखब दत्त का था जो इराक के एक छोटे से गाँव में रहता था,जिसे अल हिंदिया कहा जाता है . जब सन 681 में हजरत अली का निधन हो गया तो , मुआविया बिन अबू सुफ़यान खलीफा बना . वह बहुत कम समय तक रहा .फउसके बाद उसका लड़का यजीद सन 682 में खलीफा बन गया . यजीद एक अय्याश , अत्याचारी . व्यक्ति था .वह सारी सत्ता अपने हाथों में रखना चाहता था .इसलिए उसने सूबों के सभी अधिकारीयों को पत्र भेजा और उनसे अपने समर्थन में बैयत ( oth of allegience देने पर दबाव दिया .कुछ लोगों ने डर या लालच के कारण यजीद का समर्थन कर दिया . लेकिन इमाम हुसैन ने बैयत करने से साफ मना कर दिया .यजीद को आशंका थी कि यदि इमाम हुसैन भी बैयत नहीं करेंगे तो उसके लोग भी इमाम के पक्ष में हो जायेंगे .यजीद तो युद्ध कि तय्यारी करके बैठा था .लेकिन इमाम हुसैन युद्ध को टालना चाहते थे ,यह हालत देखकर शहर बानो ने अपने पुत्र जैनुल अबिदीन के नाम से एक पत्र उज्जैन के राजा चन्द्रगुप्त को भिजवा दिया था .जो आज भी जयपुर महाराजा के संग्राहलय में मौजूद है .बरसों तक यह पत्र ऐसे ही दबा रहा ,फिर एक अंगरेज अफसर Sir Thomas Durebrught ने 26 फरवरी 1809 को इसे खोज लिया और पढ़वाया ,और राजा को दिया , जब यह पत्र सन 1813 में प्रकाशित हुआ तो सबको पता चल गया . 

उस समय उज्जैन के राजा ने करीब 5000 सैनिकों के साथ अपने सेनापति भूरिया दत्त को मदीना कि तरफ रवाना कर दिया था .लेकिन इमाम हसन तब तक अपने परिवार के 72 लोगों के साथ कूफा कि तरफ निकल चुके थे ,जैनुल अबिदीन उस समय काफी बीमार था ,इसलिए उसे एक गुलाम के पास देखरेख के लिए छोड़ दिया था .भूरिया दत्त ने सपने भी नहीं सोचा होगा कि इमाम हुसैन अपने साथ ऐसे लोगों को लेकर कुफा जायेंगे जिन में औरतें , बूढ़े और दुधापीते बच्चे भी होंगे .उसने यह भी नहीं सोचा होगा कि मुसलमान जिस रसूल के नाम का कलमा पढ़ते हैं उसी के नवासे को परिवार सहित निर्दयता से क़त्ल कर देंगे .और यजीद इतना नीच काम करेगा . वह तो युद्ध की योजना बनाकर आया था . तभी रस्ते में ही खबर मिली कि इमाम हुसैन का क़त्ल हो गया . यह घटना 10 अक्टूबर 680 यानि 10 मुहर्रम 61 हिजरी की है .यह हृदय विदारक खबर पता चलते ही वहां के सभी हिन्दू( जिनको आजकल हुसैनी ब्राहमण कहते है ) मुख़्तार सकफी के साथ इमाम हुसैन के क़त्ल का बदला लेने को युद्ध में शामिल हो गए थे .इस घटना के बारे में "हकीम महमूद गिलानी" ने अपनी पुस्तक "आलिया " में विस्तार से लिखा है 
कर्बला की घटना को युद्ध कहना ठीक नहीं होगा ,एक तरफ तिन दिनों के प्यासे इमाम हुसैन के साथी और दूसरी तरफ हजारों की फ़ौज थी ,जिसने क्रूरता और अत्याचार की सभी सीमाएं पर कर दी थीं ,यहाँ तक इमाम हुसैन का छोटा बच्चा जो प्यास के मारे तड़प रहा था , जब उसको पानी पिलाने इमाम नदी के पास गए तो हुरामुला नामके सैनिक ने उस बच्चे अली असगर के गले पर ऐसा तीर मारा जो गले के पार हो गया . इसी तरह एक एक करके इमाम के साथी शहीद होते गए .

और अंत में शिम्र नामके व्यक्ति ने इमाम हुसैन का सी काट कर उनको शहीद कर दिया , शिम्र बनू उमैय्या का कमांडर था . उसका पूरा नाम "Shimr Ibn Thil-Jawshan Ibn Rabiah Al Kalbi (also called Al Kilabi 
(Arabic: شمر بن ذي الجوشن بن ربيعة الكلبي) 
था. यजीद के सैनिक इमाम हुसैन के शरीर को मैदान में छोड़कर चले गए थे .तब रिखब दत्त ने इमाम के शीश को अपने पास छुपा लिया था .यूरोपी इतिहासकार रिखब दत्त के पुत्रों के नाम इसप्रकार बताते हैं ,1सहस राय ,2हर जस राय 3,शेर राय ,4राम सिंह ,5राय पुन ,6गभरा और7 पुन्ना .बाद में जब यजीद को पता चला तो उसके लोग इमाम हुसैन का सर खोजने लगे कि यजीद को दिखा कर इनाम हासिल कर सकें . जब रिखब दत्त ने शीश का पता नहीं दिया तो यजीद के सैनिक एक एक करके रिखब दत्त के पुत्रों से सर काटने लगे ,फिर भी रिखब दत्त ने पता नहीं दिया .सिर्फ एक लड़का बच पाया था . जब बाद में मुख़्तार ने इमाम के क़त्ल का बदला ले लिया था तब विधि पूर्वक इमाम के सर को दफनाया गया था .यह पूरी घटना पहली बार कानपुर में छपी थी .story had first appeared in a journal (Annual Hussein Report, 1989) printed from Kanpur (UP) .The article ''Grandson of Prophet Mohammed (PBUH

रिखब दत्त के इस बलिदान के कारण उसे सुल्तान की उपाधि दी गयी थी .और उसके बारे में "जंग नामा इमाम हुसैन " के पेज 122 में यह लिखा हुआ है ,"वाह दत्त सुल्तान ,हिन्दू का धर्म मुसलमान का इमान,आज भी रिखब दत्त के वंशज भारत के अलावा इराक और कुवैत में भी रहते हैं ,और इराक में जिस जगह यह लोग रहते है उस जगह को आज भी हिंदिया कहते हैंयह विकी पीडिया से साबित है 

तबसे आजतक यह हुसैनी ब्राह्मण इमाम हुसैन के दुखों को याद करके मातम मनाते हैं .लोग कहते हैं कि इनके गलों में कटने का कुदरती निशान होता है .यही उनकी निशानी है .