Friday, 8 November 2013

संन्यासी, हिंदू धर्म के उद्धारक या संहारक?

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।।।वेदों में कहा गया है कि नदी के किनारे लगे वृक्ष को जिस तरह सभी तरह के पोषक तत्व मिलते रहते हैं उसी तरह सुख और दुख सभी अवस्था में जो व्यक्ति परमेश्वर (ब्रह्म) को पकड़कर रखता है वह कभी मुर्झाता नहीं है। दुखों को दूर करने की एक ही औषधि है- 'कायम रहना काम पर और पक्का रहना परमेश्वर पर।।'

वैदिक काल में संत को ऋषि-मुनि कहा जाता था। ये सभी ऋषि या मुनि अरण्य या हिमालय में अपने-अपने आश्रम में रहकर तप करते थे। इसे तपोभूमि भी कहा जाता था। संसार से ये संत कटे हुए रहते थे और यम-नियम का पालन करते हुए कठित तप-योग करते थे। कुंभ या चातुर्मास के दौरान ही संत सांसारिक जीवन में आकर समाज के हाल-चाल जानते थे। इस दौरान संत लोगों से कुछ लेते नहीं थे बल्कि उन्हें कुछ देकर ही जाते थे। इसके अलावा जिन लोगों को दीक्षा देना होती उन्हें वे साथ लेकर चले जाते थे। 

चार आश्रम को जानिए

हमारे ऋषि-मुनियों ने चार आश्रम की स्थापना की- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। ये आश्रम इसलिए स्थापित किए ताकि गृहस्थ और संन्यासी में फर्क किया जा सके, लेकिन आजकल गृहस्थ ही खुद को संन्यासी या संत मानने लगे हैं। वे सभी सुख-सुविधाओं के बीच रहकर उन्हें भोगते हुए खुद को संत या संन्यासी बताते हैं। लोग ऐसे तथाकथित संतों से दीक्षा लेकर उन्हें अपना गुरु मानते हैं। ये ऐसे गुरु घंटाल हैं कि लोगों को देते कुछ नहीं बल्कि लोगों के पास जो है उसे भी छीन लेते हैं। निर्मल बाबा दसवंत के नाम पर छीनते हैं तो आसाराम करोड़ों का दान लेकर।

धार्मिक टीवी चैनलों पर आने वाले तथाकथित साधु, ज्योतिष या भ्रमित करने वाली पुस्तकें लोगों को अनेक मंत्र, देवता आदि के बारे में बताते और डराते रहते हैं किंतु ये सभी भटकाव के रास्ते हैं। भ्रम-द्वंद्व, डर में जीने वाला या भटका हुआ व्यक्ति कभी भी कहीं भी नहीं पहुंच पाता। वह कभी किसी मंत्र या देवता का सहारा लेता है तो कभी किसी दूसरे मंत्र या देवता का। ऐसा व्यक्ति किनारे से दूर होता जाता है और हमेशा द्वंद्व और दुविधा में रहकर जीवन नष्ट कर लेता है।


पिछले कई वर्षों में हिन्दुत्व को लेकर व्यावसायिक संतों, ज्योतिषियों और धर्म के तथाकथित संगठनों और राजनीतिज्ञों ने हिन्दू धर्म के लोगों को पूरी तरह से गफलत में डालने का जाने-अनजाने भरपूर प्रयास किया, जो आज भी जारी है। हिन्दू धर्म की मनमानी व्याख्या और मनमाने नीति-नियमों के चलते खुद को व्यक्ति एक चौराहे पर खड़ा पाता है। समझ में नहीं आता कि इधर जाऊं या उधर।

भ्रमित समाज लक्ष्यहीन हो जाता है। लक्ष्यहीन समाज में मनमाने तरीके से परंपरा का जन्म और विकास होता है, जो कि होता आया है। मनमाने मंदिर बनते हैं, मनमाने देवता जन्म लेते हैं और पूजे जाते हैं। मनमानी पूजा पद्धति, त्योहार, चालीसाएं, प्रार्थनाएं विकसित होती हैं। व्यक्ति पूजा का प्रचलन जोरों से पनपता है। भगवान को छोड़कर संत, कथावाचक या पोंगा-पंडितों को पूजने का प्रचलन बढ़ता है।

वर्तमान दौर में अधिकतर नकली और ढोंगी संतों और कथावाचकों की फौज खड़ी हो गई है। धर्म को पूरी तरह अब व्यापार में बदल दिया गया है। धार्मिक चैनलों को देखकर जरा भी अध्यात्म की अनुभूति नहीं होती। सभी पोंगा-पंडित अपने अपने प्रॉडक्ट लेकर आ जाते हैं। अजीब-अजीब तरह के तर्क देते हैं और धर्म की मनमानी व्याखाएं करते हैं।


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इन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के पहवाने और व्यवहार को देखकर दुख होता है कि इन्होंने धर्म का सत्यानाश कर दिया है। कोई इन्हें रोकने वाला नहीं है, क्योंकि हम लोकतंत्र में जी रहे हैं। इनकी अजीब तरह की हरकतों को देखकर लगता है कि कौन विश्वास करेगा धर्म पर? ये फूहड़ तरीके से नाचते हैं, जैसे कि आसारामजी नाचते थे। आजकल वे जेल में जप करते होंगे।

लाखों ज्योतिषियों की फौज है, जो मनगढ़ंत तरीके से भविष्य बताते हैं। अभी तो टीवी चैनल पर एक लाल किताब का विशेषज्ञ भी बाबा बन बैठा है, जो भविष्य में ज्योतिष का महल खड़ा करना चाहता है। ऐसा महल जिसके नीचे धर्म भी हो। एक भव्य महल यानी अब हिन्दू जनता नए तरीके से भटकेगी और नए तरीके से डरेगी। अधिकतर हिंदुओं का जीवन तो ग्रह-नक्षत्र ही तय करते हैं- भगवान नहीं, ईश्वर नहीं। ग्रह-नक्षत्रों से डरने वालों की एक अलग ही जमात है, ये क्या भक्ति करेगी? ये नए तरीके से समाज को दूषित करेंगे।

तरह-तरह के लक्ष्मी यंत्र, कुबेर यंत्र बेचे जा रहे हैं। कैसा भी दुख हो उसे दूर करने के उपाय बताए जा रहे हैं। हिन्दू धर्म के नाम पर तरह-तरह के अंधविश्‍वास फैलाए जा रहे हैं और लोगों को हर तरफ से डराकर उनके मन में द्वंद्व और दुविधा डालकर उनसे मोटी रकम ऐंठी जा रही है। इनके प्रचार-प्रसार के चलते जनता पहले की अपेक्षा अब ज्यादा अंधविश्वासी हो चली है। समाज भयभीत रहने लगा है।

सवाल यह उठता है कि क्या इन्हें रोकने के लिए हिन्दू संत समाज के संत कोई कदम क्यों नहीं उठाते? 


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संतों के चमचे : हिन्दू जनता भी भ्रमित है। इसे भोली-भाली जनता कहना उचित नहीं होगा। यह जनता जानते-बूझते हुए भी किसी न किसी बाबा या ज्योतिषी के चक्कर काटती रहती है, क्योंकि इस जनता को धर्म का ज्ञान नहीं है। जीवन में कभी गीता नहीं पढ़ी, वेद नहीं पढ़े। कभी राम-कृष्ण पर भरोसा नहीं किया, तो निश्चित ही जीवन एक भटकाव ही रहेगा। मरने के बाद भी भटकाव।

यह तथाकथित भोली-भाली, लेकिन समझदार जनता हर किसी को अपना गुरु मानकर उससे दीक्षा लेकर उसका बड़ा-सा फोटो घर में लगाकर उसकी पूजा करती है। भगवान के सारे फोटो तो किसी कोने-कुचाले में वार-त्योहर पर ही साफ होते होंगे। यह जनता अपने तथाकथित गुरु के नाम या फोटोजड़ित लॉकेट गले में पहनती है। यह धर्म का अपमान और पतन ही माना जाएगा।

संभवत: ओशो रजनीश के चेलों ने सबसे पहले गले में लॉकेट पहनना शुरू किया था। अब इसकी लंबी लिस्ट है। श्रीश्री रविशंकर के चेले, आसाराम बापू के चेले, सत्य सांई बाबा के चेले के अलावा हजारों गुरु घंटाल हैं और उनके चेले तो उनसे भी महान हैं। ये चेले कथित रूप से महान गुरु से जुड़कर खुद में भी महानता का बोध पाले बैठे हैं। किसी संत का शिष्य बनना या किसी संत से दीक्षा लेना यह इन तथा‍कथित चेलों को नहीं मालूम। यह सब हिन्दू धर्म के नियमों के विरुद्ध है।

हिंदू संत कौन : हिन्दू संत बनना बहुत कठिन है, ‍क्योंकि संत संप्रदाय में दीक्षित होने के लिए कई तरह के ध्यान, तप और योग की क्रियाओं से व्यक्ति को गुजरना होता है तब ही उसे शैव या वैष्णव साधु-संत मत में प्रवेश मिलता है। इस कठिनाई, अकर्मण्यता और व्यापारवाद के चलते ही कई लोग स्वयंभू साधु और संत कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो चले हैं। इन्हीं नकली साधु्ओं के कारण हिन्दू समाज लगातार बदनाम और भ्रमित भी होता रहा है, हालांकि इनमें से कमतर ही सच्चे संत होते हैं।

हिन्दू धर्म में 'कर्पूर' जलाना क्यों जरूरी?

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कर्पूरगौरम करुणावतारम संसारसारं भुजगेंद्रहारम।
सदावसंतम हृदयारविन्दे भवम भवानी सहितं नमामि।।

अर्थात : कर्पूर के समान चमकीले गौर वर्णवाले, करुणा के साक्षात् अवतार, इस असार संसार के एकमात्र सार, गले में भुजंग की माला डाले, भगवान शंकर जो माता भवानी के साथ भक्तों के हृदय कमलों में सदा सर्वदा बसे रहते हैं...हम उन देवाधिदेव की वंदना करते हैं। 

हिन्दू धर्म में संध्यावंदन, आरती या प्रार्थना के बाद कर्पूर जलाकर उसकी आरती लेने की परंपरा है। पूजन, आरती आदि धार्मिक कार्यों में कर्पूर का विशेष महत्व बताया गया है। रात्रि में सोने े पूर्व कर्पूजलाकर सोना ो र ी लाभदायक है।
कर्पूर के फायदे :

पितृदोष निदान : कर्पूर अति सुगंधित पदार्थ होता है। इसके दहन से वातावरण सुगंधित हो जाता है। कर्पूर जलाने से देवदोष व पितृदोष का शमन होता है।

अनिंद्रा : रात में सोते वक्त कर्पूर जलाने से नींद अच्छी आती है। प्रतिदिन सुबह और शाम कर्पूर जलाते रहने से घर में किसी भी प्रकार की आकस्मि घटना और दुर्घटना नहीं होती।

जीवाणु नाशक : वैज्ञानिक शोधों से यह भी ज्ञात हुआ है कि इसकी सुगंध से जीवाणु, विषाणु आदि बीमारी फैलाने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं जिससे वातावरण शुद्ध हो जाता है तथा बीमारी होने का भय भी नहीं रहता। 

औषधि के रूप में उपयोग :
* कर्पूर का तेल त्वचा में रक्त संचार को सहज बनाता है।
* गर्दन में दर्द होने पर कर्पूर युक्त बाम लगाने पर आराम मिलता है।
* सूजन, मुहांसे और तैलीयत्वचा के उपचार में इसका उपयोग किया जाता है।
* आर्थराइटिस के दर्द से राहत पाने के लिए कर्पूर मिश्रित मलहम का प्रयोग करें।
* पानी में कर्पूर के तेल की कुछ बूंदों को डालकर नहाएं। यह आपको तरोताजा रखेगा।
* कफ की वजह से छाती में होने वाली जकड़न में कर्पूर का तेल मलने से राहत मिलती है।
* कर्पूर युक्त मलहम की मालिश से मोच और मांसपेशियों में खिंचाव और दर्द में राहत मिलती है।

नोट : गर्भावस्था या अस्थमा के मरीजों को कर्पूर तेल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

Thursday, 7 November 2013

छठ का पौराणिक महत्व

हमारे देश में सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ। मुख्य रूप से इसे सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। 

पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है।

इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएं प्रचलित हैं। 

रामायण- एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। 

महाभारत- एक दूसरी मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।

छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी।


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पुराण- पुराण में इस बारे में एक और कथा प्रचलित है। एक अन्य कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियवद की पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर शमशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे।

उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि ‘सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो’। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।

Tuesday, 5 November 2013

ब्रह्म काल

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'सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही था, जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से सांस ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।' 'ब्रह्म वह है, जिसमें से संपूर्ण सृष्टि और आत्माओं की उत्पत्ति हुई है या जिसमें से ये फूट पड़े हैं। विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का कारण ब्रह्म है।' -(ऋग्वेद, उपनिषद)

ब्रह्म से आत्मा। आत्मा से जगत की उत्पत्ति हुई। महर्षि अरविंद ने अपनी किताब 'दिव्य जीवन' में इस संबंध में बहुत अच्छे से लिखा है। उन्होंने जहां पुराणों के अनुसार धरती पर जीवन की उत्पत्ति, विकास और उत्थान के बारे में बताया है वहीं उन्होंने वेदों की पंचकोशों की धारणा को विज्ञान की कसौटी पर कसा है।

जब धरती ठंडी होने लगी तो उस पर बर्फ और जल का साम्राज्य हो गया। तब धरती पर जल ही जल हो गया। इस जल में ही जीवन की उत्पत्ति हुई। आत्मा ने ही खुद को जलरूप में व्यक्त किया। इस जलरूप ने ही करोड़ों रूप धरे। जल का यह रूप हिरण्यगर्भ में जन्मा अर्थात जल के गर्भ में जन्मा।

सर्वप्रथम : सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ से अंडे के रूप का एक मुख प्रकट हुआ। मुख से वाक् इन्द्री, वाक् इन्द्री से 'अग्नि' उत्पन्न हुई। तदुपरांत नाक के छिद्र प्रकट हुए। नाक के छिद्रों से 'प्राण' और प्राण से 'वायु' उत्पन्न हुई। फिर नेत्र उत्पन्न हुए। नेत्रों से चक्षु (देखने की शक्ति) प्रकट हुए और चक्षु से 'आदित्य' प्रकट हुआ। फिर 'त्वचा', त्वचा से 'रोम' और रोमों से वनस्पति-रूप 'औषधियां' प्रकट हुईं। उसके बाद 'हृदय', 'हृदय' से 'मन, 'मन से 'चन्द्र' उदित हुआ। तदुपरांत नाभि, नाभि से 'अपान' और अपान से 'मृत्यु' का प्रादुर्भाव हुआ। फिर 'जननेन्द्रिय, 'जननेन्द्रिय से 'वीर्य' और 'वीर्य' से 'आप:' (जल या सृजनशीलता) की उत्पत्ति हुई।

यहां वीर्य से पुन: 'आप:' की उत्पत्ति कही गई है। यह आप: ही सृष्टिकर्ता का आधारभूत प्रवाह है। वीर्य से सृष्टि का 'बीज' तैयार होता है। उसी के प्रवाह में चेतना-शक्ति पुन: आकार ग्रहण करने लगती है। सर्वप्रथम यह चेतना-शक्ति हिरण्य पुरुष के रूप में सामने आई।

अति सूक्ष्म रूप में जीवन की उत्पत्ति के बाद मोटेतौर पर वनस्पत्तियों, लताओं और फिर वृक्षों की उत्पत्ति हुई। इस क्रम में आगे चलकर एककोशीय और फिर बहुकोशीय जीवों की उत्पत्ति हुई।

कुछ ऐसे जीव उत्पन्न हुए जिसमें हड्डी न होती थी तथा ये किसी पतले इमली, नीम के पत्ते की तरह होते थे। प्रारंभ में ये सभी जल के भीतर की भूमि से जुड़े रहते थे। ऐसे जीव जो एकेंद्रीय थे अर्थात वे न देख सकते थे, न सुन सकते थे, न स्वाद ले सकते थे। बस स्पर्श ही उनकी अनुभूति थी।

इसी क्रम में आगे चलकर एक पत्तेनुमा मछली की उत्पत्ति हुई। फिर मछली ने कई रूप धरे। हिन्दू धर्म में मछली को पवित्र जलचर जंतु माना जाता है। जल के अंदर मछली की उत्पत्ति सबसे बड़ी घटना थी। संभवत: यह घटना 3 अरब वर्ष पहले की है।


वराह काल और कच्छप काल : जब वराह काल में धरती के कुछ भाग को जल से ऊपर प्रकट किया गया तो प्रारंभ में कुछ आदिकालीन शैवाल और वनस्पतियों ने धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। यही धीरे-धीरे वृक्ष का आकार लेने लगी।

इन छोटी-छोटी घासों के पीछे आए उभयचर प्राणी, कीट, कीड़े और सरीसृप आदि। यही धरती पर और जल में अपनी सत्ता जमाने लगे। इनमें से कई हिंसक प्राणियों से बचने के लिए कीटों ने वृक्षों पर चढ़ना सीखा और उनमें से ही कुछ कीटों में पंख निकलने लगे और इस तरह आकाश में कीट-पतंगों की भरमार होने लगी।

इधर कई उभयचर प्राणियों में कछुआ सबसे विकसित प्राणी था और उन्हीं आदिकालीन प्रजातियों में से कुछ उड़ना सीखकर पक्षी होने लगे। कुछ धरती पर नए-नए रूप धरने लगे। सर्वप्रथम जमीन पर बसने वाले प्राणियों ने अपनी जड़ें पानी में ही जमाए रखीं, उसी तरह जिस तरह कि वनस्पत्तियों और पौधों ने। ऐसा इसलिए कि वे धरती पर ज्यादा देर तक रह नहीं सकते थे। उन्हें सांस लेने के लिए जल में लौटना ही पड़ता था।


हिन्दू धर्म में सर्प को इसलिए महत्व दिया जाता है कि जहां जल में इसकी करोड़ों प्रजातियां थीं वहीं धरती पर सबसे पहले इसका ही साम्राज्य स्थापित हुआ। यह जल के बगैर भी धरती पर कई दिनों तक रहने में कामयाब रहा और इसने अन्य प्राणियों की अपेक्षा सबसे पहले जल पर अपनी निर्भरता छोड़ दी। इसकी ऐसी भी प्रजातियां थीं, जो उड़ने में सफल हो गई थीं।

वराह, कच्छप और सर्प ने धरती पर जीवन के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिस तरह सर्प की कुछ अन्य प्रजातियां उड़ने में सफल हो गई थीं उसी तरह कछुए की प्रजातियां भी कुछ इसमें सफल रहीं और इस तरह आकाश में कीट-पतंगों, मछलियों, कछुओं और सर्पों की भिन्न-भिन्न प्रजातियों ने आकाश को हरा-भरा कर दिया।


जैसे-जैसे समय बीतता गया, धरा के पर्यावरण में भारी बदलाव आते गए। जो जीव इन परिवर्तनों के अनुसार अपने आपको ढाल नहीं सके, वे हमेशा के लिए विलुप्त हो गए और जिन्होंने खुद को बचाए रखा वे विजेता कहलाए। उनमें मछली, सर्प, कछु्आ, मगरमच्छ, कीट-पतंगें, चींटी, मकोड़े आदि जलचर और उभयचर प्राणी तो आज भी हैं, लेकिन अब सवाल यह उठता है कि मनुष्य कैसे और किससे बना?

इसके लिए हिन्दू धर्म में दो सिद्धांत हैं- 1. मनुष्य को ईश्वर ने बनाया, 2. क्रम विकास के तहत मनुष्य बना मछली जैसे प्राणी से।

1. मनुष्य को ईश्वर ने बनाया : ब्रह्म से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई और ब्रह्मा ने खुद को दो भागों में विभक्त कर लिया। उसका पुरुष रूप एक भाग का नाम था स्वायंभुव मनु और स्त्री रूप दूसरे का नाम शतरूपा था। सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। प्रमाण यही बताते हैं कि आदि सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखंड अर्थात इस ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ही हुई। 


2. मनुष्य बना मछली जैसे प्राणी से : आज का मनुष्य मछली की लाखों प्रजातियों में से एक विशेष मछली का विकसित रूप है। विकास के क्रम में उसने कई महत्वपूर्ण रूप बदले। लेकिन पूर्व काल में मनुष्य सिर्फ मछली का ही विकसित रूप नहीं रहा और ‍भी कई ऐसे जीव-जंतु थे, जो न मालूम कब वानर की भिन्न-भिन्न प्रजातियां बनते गए और अंतत: उन्हीं में से एक आज का आधुनिक मनुष्य बना। जिस तरह मछलियां हजारों प्रजातियों में पाई जाती हैं उसी तरह मानव भी आदिकाल में हजारों प्रजातियों में थे। हालांकि आज हमें अफ्रीकी, यूरोपीय, चीनी, भारतीय आदि क्षे‍त्र की मानव प्रजातियां ही नजर आती हैं।


वेद में सृष्टि की उत्पत्ति, विकास, विध्वंस और आत्मा की गति को पंचकोश के क्रम में समझाया गया है। पंचकोश ये हैं- 1. अन्नमय, 2. प्राणमय, 3. मनोमय, 4. विज्ञानमय और 5. आनंदमय। उक्त पंचकोश को ही 5 तरह का शरीर भी कहा गया है। वेदों की उक्त धारणा विज्ञानसम्मत है।

इस विषय पर सरल और विस्तृत भाषा में जानने के लिए पढ़ें...


दो गोलार्ध हैं- एक उर्ध्व और दूसरा अधो। जब आत्मा नीचे गिरती है तो जड़ हो जाती है और इस तरह वह विकास क्रम का हिस्सा बनकर अपने पुरुषार्थ से ऊपर उठना शुरू करती है और अंतत: स्वयं के आनंदस्वरूप को पुन: प्राप्त कर लेती है। लेकिन कुछ ऐसी भी आत्माएं हैं, जो कभी नीचे नहीं गिरीं और जाग्रत हो गईं, वे ही आत्माएं देवात्माएं कहलाईं। उनके कारण भी सृष्टि उत्पत्ति, विकास और विध्वंस हुआ।

महर्षि अरविंद ने अपनी किताब 'दिव्य जीवन' में इस संबंध में बहुत अच्छे से लिखा है।

संदर्भ : वेद, पुराण और महर्षि अरविंद की किताब 'दिव्य जीवन' से प्रेरित।

Monday, 7 October 2013

व्रत और उपवास

व्रत और उपवास में सबसे श्रेष्ठ प्रत्येक माह की एकादशी और श्रावण माह के प्रत्येक दिन को पवित्र और व्रत लायक माना गया है। प्रत्येक हिन्दू को उक्त दिन खुद को पवित्र रखकर इनका पालन करना चाहिए।

हिन्दु्ओं के आठ प्रमुख कर्तव्य है:- 1.संध्योपासन, 2.व्रत, 3.तीर्थ, 4.उत्सव, 5.सेवा, 6.दान, 7.यज्ञ, और 8.संस्कार। इन 8 में से जानिए व्रत या उपवास के बारे में संपूर्ण जानकारी। 

उपवास को हम यहां अनाहार के अर्थ में लेते हैं। उपवास एक प्रकार की शक्ति है जिसके बल से जहां रोगों को दूर कर सेहतमंद रहा जा सकता है, वहीं इसके माध्यम से सिद्धि और समृद्धि भी हासिल की जा सकती है। उपवास के अभ्यास से व्यक्ति कई-कई महीनों तक भूख और प्यास से मुक्त रह सकता है।

आप समझते हैं कि भोजन न करना ही उपवास या व्रत है तो आपकी यह समझ अधूरी है। उपवास या व्रत का अर्थ बहुत व्यापक है। शास्त्रों में मुख्यत‍: 4 तरह के व्रत और 13 तरह के उपवास बताए गए हैं। बहुत से तपस्वी अपने तप की शुरुआत उपवास से ही करते हैं।

संकल्पपूर्वक किए गए कर्म को व्रत कहते हैं। किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दिनभर के लिए अन्न या जल या अन्य तरह के भोजन या इन सबका त्याग व्रत कहलाता है। व्रत धर्म का साधन माना गया है। उपवास का अर्थ होता है ऊपर वाले का मन में निवास। उपवास को व्रत का अंग भी माना गया है।

व्रतों के प्रकार : व्रत और उपवास के कई प्रकार हैं। वेदों में अलग और पुराणों में अलग। सूर्य और चंद्र तिथि अनुसार व्रतों के कई प्रकार बताए गए हैं। हालांकि सभी तरह के व्रतों को मुख्यत: 3 भागों में बांटा जा सकता है और उपवास को 13...।

व्रत के तीन प्रकार- 1.नित्य, 2.नैमित्तिक और 3.काम्य

1.नित्य व्रत उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर भक्ति या आचरणों पर बल दिया जाता है, जैसे सत्य बोलना, पवित्र रहना, इंद्रियों का निग्रह करना, क्रोध न करना, अश्लील भाषण न करना और परनिंदा न करना, प्रतिदिन ईश्वर भक्ति का संकल्प लेना आदि नित्य व्रत हैं। इनका पालन नहीं करते से मानव दोषी माना जाता है।

2.नैमिक्तिक व्रत उसे कहते हैं जिसमें किसी प्रकार के पाप हो जाने या दुखों से छुटकारा पाने का विधान होता है। अन्य किसी प्रकार के निमित्त के उपस्थित होने पर चांद्रायण प्रभृति, तिथि विशेष में जो ऐसे व्रत किए जाते हैं वे नैमिक्तिक व्रत हैं।

3.काम्य व्रत किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाते हैं, जैसे पुत्र प्राप्ति के लिए, धन- समृद्धि के लिए या अन्य सुखों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले व्रत काम्य व्रत हैं।


उपवास के प्रकार- 1.प्रात: उपवास, 2.अद्धोपवास, 3.एकाहारोपवास, 4.रसोपवास, 5.फलोपवास, 6.दुग्धोपवास, 7.तक्रोपवास, 8.पूर्णोपवास, 9.साप्ताहिक उपवास, 10.लघु उपवास, 11.कठोर उपवास, 12.टूटे उपवास, 13.दीर्घ उपवास।

1.प्रात: उपवास- इस उपवास में सिर्फ सुबह का नाश्ता नहीं करना होता है और पूरे दिन और रात में सिर्फ 2 बार ही भोजन करना होता है।

2.अद्धोपवास- इस उपवास को शाम का उपवास भी कहा जाता है और इस उपवास में सिर्फ पूरे दिन में एक ही बार भोजन करना होता है। इस उपवास के दौरान रात का भोजन नहीं खाया जाता।

3.एकाहारोपवास- एकाहारोपवास में एक समय के भोजन में सिर्फ एक ही चीज खाई जाती है, जैसे सुबह के समय अगर रोटी खाई जाए तो शाम को सिर्फ सब्जी खाई जाती है। दूसरे दिन सुबह को एक तरह का कोई फल और शाम को सिर्फ दूध आदि।

4.रसोपवास- इस उपवास में अन्न तथा फल जैसे ज्यादा भारी पदार्थ नहीं खाए जाते, सिर्फ रसदार फलों के रस अथवा साग-सब्जियों के जूस पर ही रहा जाता है। दूध पीना भी मना होता है, क्योंकि दूध की गणना भी ठोस पदार्थों में की जा सकती है।

5.फलोपवास- कुछ दिनों तक सिर्फ रसदार फलों या भाजी आदि पर रहना फलोपवास कहलाता है। अगर फल बिलकुल ही अनुकूल न पड़ते हो तो सिर्फ पकी हुई साग-सब्जियां खानी चाहिए।


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6.दुग्धोपवास- दुग्धोपवास को 'दुग्ध कल्प' के नाम से भी जाना जाता है। इस उपवास में सिर्फ कुछ दिनों तक दिन में 4-5 बार सिर्फ दूध ही पीना होता है।

7.तक्रोपवास- तक्रोपवास को 'मठाकल्प' भी कहा जाता है। इस उपवास में जो मठा लिया जाए, उसमें घी कम होना चाहिए और वो खट्टा भी कम ही होना चाहिए। इस उपवास को कम से कम 2 महीने तक आराम से किया जा सकता है।

8.पूर्णोपवास- बिलकुल साफ-सुथरे ताजे पानी के अलावा किसी और चीज को बिलकुल न खाना पूर्णोपवास कहलाता है। इस उपवास में उपवास से संबंधित बहुत सारे नियमों का पालन करना होता है।

9.साप्ताहिक उपवास- पूरे सप्ताह में सिर्फ एक पूर्णोपवास नियम से करना साप्ताहिक उपवास कहलाता है।

10.लघु उपवास- 3 से लेकर 7 दिनों तक के पूर्णोपवास को लघु उपवास कहते हैं।


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11.कठोर उपवास- जिन लोगों को बहुत भयानक रोग होते हैं यह उपवास उनके लिए बहुत लाभकारी होता है। इस उपवास में पूर्णोपवास के सारे नियमों को सख्ती से निभाना पड़ता है।

12.टूटे उपवास- इस उपवास में 2 से 7 दिनों तक पूर्णोपवास करने के बाद कुछ दिनों तक हल्के प्राकृतिक भोजन पर रहकर दोबारा उतने ही दिनों का उपवास करना होता है। उपवास रखने का और हल्का भोजन करने का यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि इस उपवास को करने का मकसद पूरा न हो जाए।

13.दीर्घ उपवास- दीर्घ उपवास में पूर्णोपवास बहुत दिनों तक करना होता है जिसके लिए कोई निश्चित समय पहले से ही निर्धारित नहीं होता। इसमें 21 से लेकर 50-60 दिन भी लग सकते हैं। अक्सर यह उपवास तभी तोड़ा जाता है, जब स्वाभाविक भूख लगने लगती है अथवा शरीर के सारे जहरीले पदार्थ पचने के बाद जब शरीर के जरूरी अवयवों के पचने की नौबत आ जाने की संभावना हो जाती है।

*सावधानी : उक्त सभी उपवास का लक्ष्य शरीर के अलग-अलग भागों में इकट्ठे हुए जहरीले पदार्थों को बाहर निकालकर मन और शरीर को मजबूत करने से है। कुछ लोग उपवास किसी सिद्धि को प्राप्त करने के लिए करते हैं तो कुछ लोग कठित तप, साधना और मोक्ष के लिए करते हैं।

प्रत्येक उपवास अलग-अलग मकसद के लिए किया जाता है और सभी के लाभ भी अलग-अलग होते हैं। आम जनता को उपवास के महत्व और मकसद को समझकर ही उपवास करना चाहिए। बिना तैयारी किए तथा बिना उपवास के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त किए उक्त उपवास नहीं करना चाहिए।

*उपवास योग का लाभ : किसी भी प्रकार का गंभीर रोग इस योग द्वारा समाप्त किया जा सकता है। शरीर सहित मन और मस्तिष्क को हमेशा संतुलित और स्वस्थ बनाए रखा जा सकता है। इससे व्यक्ति की आयु बढ़ती है तथा व्यक्ति जीतेंद्रिय कहलाता है।

Friday, 4 October 2013

नवदुर्गा के नौ रूप

नवदुर्गा के नौ रूप

  1.शैलपुत्री
 

देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं। दुर्गाजी पहले स्वरूप में ‘शैलपुत्री’ के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है। वृषभ-स्थिता इन माताजी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। तब इनका नाम ‘सती’ था। इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था।

ध्यान मंत्र

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्राद्र्वकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्॥

अर्थात- देवी वृषभ पर विराजित हैं। शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा है। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री का पूजन करना चाहिए।

2.ब्रह्मचारिणी
 

नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल रहता है। इस दिन साधक कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए भी साधना करते हैं। जिससे उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें।

माँ दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।

माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।

इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं।
प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।

 3.चंद्रघंटा
 

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन ‘मणिपूर’ चक्र में प्रविष्ट होता है।
माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

उपासना

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।

 4.कूष्माण्डा
 

नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘अदाहत’ चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचंचल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए।

जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं।

इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। माँ की आठ भुजाएँ हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है।

चतुर्थी के दिन माँ कूष्मांडा की आराधना की जाती है। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में चतुर्थ दिन इसका जाप करना चाहिए।

उपासना

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

 5.स्कंदमाता
 

नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं।

  • कथा

भगवान स्कंद ‘कुमार कार्तिकेय’ नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है।

प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में पाँचवें दिन इसका जाप करना चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और स्कंदमाता के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। इस दिन साधक का मन ‘विशुद्ध’ चक्र में अवस्थित होता है। इनके विग्रह में भगवान स्कंदजी बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं।

 6.कात्यायिनी
 

माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। उस दिन साधक का मन ‘आज्ञा’ चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।

नवरात्रि का छठा दिन माँ कात्यायनी की उपासना का दिन होता है। इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है व दुश्मनों का संहार करने में ये सक्षम बनाती हैं। इनका ध्यान गोधुली बेला में करना होता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में छठे दिन इसका जाप करना चाहिए।


या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कात्यायनी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे दुश्मनों का संहार करने की शक्ति प्रदान कर।

इसके अतिरिक्त जिन कन्याओ के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो,उन्हे इस दिन माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हे मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है।

7.कालरात्रि
 

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है।

सहस्रार चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह भागी हो जाता है। उसके समस्त पापों-विघ्नों का नाश हो जाता है। उसे अक्षय पुण्य-लोकों की प्राप्ति होती है।

मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे पाप से मुक्ति प्रदान कर।

8.महागौरी
 

माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं जाते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।

इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- ‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी।’ इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं।

महागौरी की चार भुजाएँ हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है।
पुराणों में माँ महागौरी की महिमा का प्रचुर आख्यान किया गया है। ये मनुष्य की वृत्तियों को सत्‌ की ओर प्रेरित करके असत्‌ का विनाश करती हैं। हमें प्रपत्तिभाव से सदैव इनका शरणागत बनना चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।

9.सिद्धिदात्री
 

माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
अर्थ

हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।