Friday, 16 August 2013

यज्ञ और विज्ञान

इस समग्र सृष्टि के क्रियाकलाप '' यज्ञ' रूपी धुरी के चारों ओर ही चल रहें हैं ।। ऋषियों ने ''अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः'' (अथर्ववेद ९. १५. १४) कहकर यज्ञ को भुवन की- इस जगती की सृष्टि का आधार बिन्दु कहा है ।। स्वयं गीताकार योगिराज श्रीकृष्ण ने कहा है-
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः ।।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्तविष्ट कामधुक्

अर्थात- ''प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ कर्म के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो ।'' यज्ञ भारतीय संस्कृति के मनीषी ऋषिगणों द्वारा सारी वसुन्धरा को दी गयी ऐसी महत्त्वपूर्ण देन है, जिसे सर्वाधिक फलदायी एवं पर्यावरण केन्द्र इको सिस्टम के ठीक बने रहने का आधार माना जा सकता है ।।

गायत्री यज्ञों की लुप्त होती चली जा रही परम्परा और उसके स्थान पर पौराणिक आधार पर चले आ रहे वैदिकी के मूल स्वर को पृष्ठभूमि में रखकर मात्र माहात्म्य परक यज्ञों की शृंखला को पूज्यवर ने तोड़ा तथा गायत्री महामंत्र की शक्ति के माध्यम से सम्पन्न यज्ञ के मूल मर्म को जन- जन के मन में उतारा ।। यह इस युग की क्रान्ति है ।।

यज्ञ शब्द के अर्थ को समझाते हुए  समग्र जीवन को यज्ञमय बना लेने को ही वास्तविक यज्ञ कहते हैं ।। ''यज्ञार्थ् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः' के गीता वाक्य के अनुसार वे लिखते हैं कि यज्ञीय जीवन जीकर किये गये कर्मों वाला जीवन ही श्रेष्ठतम जीवन है ।। इसके अलावा किये गये सभी कर्म बंधन का कारण बनते हैं व जीवात्मा की परमात्म सत्ता से एकाकार होने की प्रक्रिया में बाधक सिद्ध होते हैं ।। यज्ञ शब्द मात्र स्वाहा- मंत्रों के माध्यम से आहुति दिये जाने के परिप्रेक्ष्य में नहीं किया जाना चाहिए, यह स्पष्ट करते हुए उनने इसमें लिखा है कि यज्ञीय जीवन से हमारा आशय है- परिष्कृत देवोपम व्यक्तित्व ।। वास्तविक देव पूजन यही है कि व्यक्ति अपने अंतः में निहित देव शक्तियों को यथोचित सम्मान देते हुए उन्हें निरन्तर बढ़ाता चले ।। महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः की मनुस्मृति की उक्ति के अनुसार सर्वश्रेष्ठ यज्ञ वह है, जिससे व्यक्ति ब्रह्ममय- ब्राह्मणत्व भरा देवोपम जीवन जीते हुए स्वयं- को अपने शरीर, मन, अन्तःकरण को परिष्कृत करता हुआ चला जाता है ।।

यज्ञ परमार्थ प्रयोजन के लिए किया गया एक उच्चस्तरीय पुरुषार्थ है ।। अन्तर्जगत् में दिव्यता का समावेश कर प्राण की अपान में अपना की प्राण में आहुति देकर जीवन रूपी समाधि को समाज रूपी यज्ञ में होम करना ही वास्तविक यज्ञ है ।। भावनाओं में यदि सत्प्रवृत्ति का समावेश होता चला जाय तो यही वास्तविक यज्ञ है ।। युग ऋषि ने यज्ञ की ऐसी विलक्षण परिभाषा कर वैदिक वाङ्मयं के मूलभूत स्वर को ही गुंजायमान किया है ।। यज् धातु से बना यज्ञ देवपूजन, परमार्थ के बाद तीसरे अंतिम अर्थ 'संगतिकरण' सज्जनों के संगठन, राष्ट्र को समर्थ सशक्त बनाने वाली सत्ताओं के एकीकरण के अर्थ परिभाषित करता है ।।

हम पेट की भूख को जठराग्नि कहते हैं और खाद्य द्रव्य उस जठर की अग्नि की उर्जा से रूपांतरित होकर शरीर को पोषण देती है ।।  आयुर्वेद में कहा गया है की सिर्फ़ पौष्टिक खाद्य पदार्थ ही नहीं, पाचन और स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है की खाने की प्रक्रिया, स्थिर चित्त एवं शांत मन से किया जाये ।।  ति स्वादिष्ट भोजन भी तृप्ति और पुष्टि देने में असमर्थ है यदि मन विक्षिप्त हो।। 

ठीक उसी तरह से, यज्ञाग्नि माध्यम है इस प्रकृति को पोषण करने का।। चूंकि यह प्रकृति हमारा पालक है और हमारा जीवन उसी के नियमों के आधीन है, यह अत्यंत आवश्यक है की हम इसके साथ एकात्मकता स्थापित करें l और यज्ञ विधान, उसी सन्दर्भ में एक आध्यात्मिक प्रयोग हैं।।  हम हूत-द्रव्य के माध्यम से, एक योजनाबद्ध तंत्र के द्वारा उस प्रकृति को पोषक तत्व का संचार करतें हैं।। अग्नि की उर्जा एवं वैदिक मंत्रोच्चार के कंपन का संगठित आन्दोलन उस हूत-द्रव्य को परिवर्तित करती है किसी सुक्ष्म तत्व में, जो की वायुमंडल में स्थित प्राण-उर्जा को निहित सकारात्मक वेग प्रदान करती है।।  और प्रकृति उसका रूपांतरण कर हम सब के लिये सुख, शांति और आनंददायक परिस्थिति का निर्माण करती है ।।  यह ही इस यज्ञ प्रणाली का ध्येय है ।। 
जैसे खाद्य को ठीक ढंग से पाचन करने के लिये ज़रूरी है की हम शांत चित्त से उचित खाद्य ग्रहण करें, ठीक वैसे ही, धैर्य और आस्थायुक्त मनःस्थिति में किया हुआ प्रामाणिक यज्ञ विधान इस युग में त्वरित फलप्रदायक उपाय है।। 


चौबीस अवतारों में एक अवतार यज्ञ भगवान भी है ।। यज्ञ हमारी संस्कृति का आराध्य इष्ट रहा है तथा यज्ञ के बिना हमारे किसी दैनन्दिन क्रिया कलाप की कल्पना तक नहीं की जा सकती ।। यज्ञ का विज्ञान पक्ष समझाते हुए पूज्यवर ने बताया है कि सारी सृष्टि की सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए यज्ञ कितनी महत्त्वपूर्ण है ।। देव तत्त्वों की तुष्टि से अर्थ है- सृष्टि संतुलन बनाये रखने वाली शक्तियों का पारस्परिक संतुलन ।। यज्ञ एक प्रकार की टैक्स है- कर है -देव सत्ताओं के प्रति इसे न देने पर जैसे राज्य- प्रशासन, जन समुदाय को दण्डित करता है, उसी प्रकार विभीषिकाएँ भिन्न- भिन्न रूपों में आकर सारी जगती पर अपना प्रकोप मचा देती है ।। दैवी प्रकोपों से बचने का वैज्ञानिक आधार है- यज्ञ ।।

करबला और ब्राह्मण

यह एक सर्वमान्य सत्य है कि इतिहास को दोहराया नहीं जा सकता है और न बदलाया जा सकता है ,क्योंकि इतिहास कि घटनाएँ सदा के लिए अमिट हो जाती है .लेकिन यह भी सत्य है कि विज्ञान कि तरह इतिहास भी एक शोध का विषय होता है .क्योंकि इतिहास के पन्नों में कई ऐसे तथ्य दबे रह जाते हैं ,जिनके बारे में काफी समय के बाद पता चलता है .ऐसी ही एक ऐतिहासिक घटना हजरत इमाम हुसैन के बारे में है वैसे तो सब जानते हैं कि इमाम हुसैन मुहम्मद साहिब के छोटे नवासे ,हहरत अली और फातिमा के पुत्र थे .और किसी परिचय के मुहताज नहीं हैं ,उनकी शहादत के बारे में हजारों किताबें मिल जाएँगी 
एक उर्दू पुस्तक "हमारे हैं हुसैन "जो सन 1960 यानि मुहर्रम 1381 हि० को इमामिया मिशन लखनौउसे प्रकाशित हुई थी.इसकी प्रकाशन संख्या 351 और लेखक "सय्यद इब्न हुसैन नकवी " है .इसी पुस्तक के पेज 11 से 13 तक से कुछ अंश लेकर ,उर्दू से नकवी जी के शब्दों को ज्यों का त्यों दिया जा रहा , जिस से पता चलता है कि इमाम हुसैन ने भारत आने क़ी इच्छा प्रकट क़ी थी 

नकवी जी ने लिखा है "हजरत इमाम हुसैन दुनियाए इंसानियत में मुहसिने आजम हैं,उन्होंने तेरह सौ साल पहले अपनी खुश्क जुबान से ,जो तिन रोज से बगैर पानी में तड़प रही थी ,अपने पुर नूर दहन से से इब्ने साद से कहा था 

"अगर तू मेरे दीगर शरायत को तस्लीम न करे तो , कम अज कम मुझे इस बात की इजाजत दे दे ,कि मैं ईराक छोड़कर हिंदुस्तान चला जाऊं"

नकवी आगे लिखते हैं ,"अब यह बात कहने कि जरुरत नहीं है कि ,जिस वक्त इमाम हुसैन ने हिंदुस्तान तशरीफ लाने की तमन्ना का इजहार किया था ,उस वक्त न तो हिंदुस्तान में कोई मस्जिद थी ,और न हिंदुस्तान में मुसलमान आबाद थे .गौर करने की बात यह है कि,इमाम हुसैन को हिंदुस्तान की हवाओं में मुहब्बत की कौन सी खुशबु महसूस हुई थी ,कि उन्होंने यह नहीं कहा कि मुझे चीन जाने दो ,या मुझे ईरान कि तरफ कूच करने दो ..उन्होंने खुसूसियत से सिर्फ हिंदुस्तान कोही याद किया था 


गालिबन यह माना जाता है कि हजरत इमाम हुसैन के बारे में हिन्दुस्तान में खबर देने वाला शाह तैमुर था .लेकिन तारीख से इंकार करना नामुमकिन है .इसलिए कहना ही पड़ता है कि इस से बहुत पहले ही " हुसैनी ब्राह्मण " द्त्त ब्रह्मिन इमाम हुसैन के मसायब बयाँ करके रोया करते थे .और आज भी हिंदुस्तान में उनकी कोई कमी नहीं है .यही नहीं जयपुर के कुतुबखाने में वह ख़त भी मौजूद है जो ,जैनुल अबिदीन कि तरफ से हिन्दुतान रवाना किया गया था .



इमाम हुसैन ने जैसा कहा था कि ,मुझे हिंदुस्तान जाने दो ,अगर वह भारत की जमीन पर तशरीफ ले आते तो ,हम कह नहीं सकते कि उस वक्त कि हिन्दू कौम उनकी क्या खिदमत करती"

प्रसिद्ध इतिहासकार राज कुमार अस्थाना ने अपने शोधग्रंथ "Ancient India " में लिखा है कि सम्राट यज्देगर्द की तीन पुत्रियाँ थी ,जिनके नाम मेहर बानो , शेहर बानो , और किश्वर बानो थे .यज्देगर्द ने अपनी बड़ी पुत्री की शादी भारत के राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय से करावा दी थी .जिसकी राजधानी उज्जैन थी ..और राजा के सेनापति का नाम भूरिया दत्तथा .जिसका एक भाई रिखब दत्त व्यापर करता था . .यह लोग कृपा चार्य के वंशज कहाए जाते हैं .चन्द्रगुप्त ने मेहर बानो का नाम चंद्रलेखा रख दिया था .क्योंकि मेहर का अर्थ चन्द्रमा होता है ..राजाके मेहर बानो से एक पुत्र समुद्रगुप्त पैदा हुआ .यह सारी घटनाएँ छटवीं शताब्दी की हैं


. यज्देगर्द ने दूसरी पुत्री शेहर बानो की शादी इमाम हुसैन से करवाई थी . और उस से जो पुत्र हुआ था उसका नाम "जैनुल आबिदीन " रखा गया .इस तरह समुद्रगुप्त और जैनुल अबिदीन मौसेरे भाई थे .इस बात की पुष्टि "अब्दुल लतीफ़ बगदादी (1162 -1231 ) ने अपनी किताब "तुहफतुल अलबाब " में भी की है .और जिसका हवाला शिशिर कुमार मित्र ने अपनी किताब "Vision of India " में भी किया है .

इमाम हुसैन के पिता हजरत अली चौथे खलीफा थे . और उस समय वह इराक के शहर कूफा में रहते थे . हजरत prm अली सभी प्रकार के लोगों से प्रेमपूर्वक वर्ताव करते थे . उन के कल में कुछ हिन्दू भी वहां रहते थे .लेकिन किसी पर भी इस्लाम कबूल करने पर दबाव नहीं डाला जाता था .ऐसा एक परिवार रिखब दत्त का था जो इराक के एक छोटे से गाँव में रहता था,जिसे अल हिंदिया कहा जाता है . जब सन 681 में हजरत अली का निधन हो गया तो , मुआविया बिन अबू सुफ़यान खलीफा बना . वह बहुत कम समय तक रहा .फउसके बाद उसका लड़का यजीद सन 682 में खलीफा बन गया . यजीद एक अय्याश , अत्याचारी . व्यक्ति था .वह सारी सत्ता अपने हाथों में रखना चाहता था .इसलिए उसने सूबों के सभी अधिकारीयों को पत्र भेजा और उनसे अपने समर्थन में बैयत ( oth of allegience देने पर दबाव दिया .कुछ लोगों ने डर या लालच के कारण यजीद का समर्थन कर दिया . लेकिन इमाम हुसैन ने बैयत करने से साफ मना कर दिया .यजीद को आशंका थी कि यदि इमाम हुसैन भी बैयत नहीं करेंगे तो उसके लोग भी इमाम के पक्ष में हो जायेंगे .यजीद तो युद्ध कि तय्यारी करके बैठा था .लेकिन इमाम हुसैन युद्ध को टालना चाहते थे ,यह हालत देखकर शहर बानो ने अपने पुत्र जैनुल अबिदीन के नाम से एक पत्र उज्जैन के राजा चन्द्रगुप्त को भिजवा दिया था .जो आज भी जयपुर महाराजा के संग्राहलय में मौजूद है .बरसों तक यह पत्र ऐसे ही दबा रहा ,फिर एक अंगरेज अफसर Sir Thomas Durebrught ने 26 फरवरी 1809 को इसे खोज लिया और पढ़वाया ,और राजा को दिया , जब यह पत्र सन 1813 में प्रकाशित हुआ तो सबको पता चल गया . 

उस समय उज्जैन के राजा ने करीब 5000 सैनिकों के साथ अपने सेनापति भूरिया दत्त को मदीना कि तरफ रवाना कर दिया था .लेकिन इमाम हसन तब तक अपने परिवार के 72 लोगों के साथ कूफा कि तरफ निकल चुके थे ,जैनुल अबिदीन उस समय काफी बीमार था ,इसलिए उसे एक गुलाम के पास देखरेख के लिए छोड़ दिया था .भूरिया दत्त ने सपने भी नहीं सोचा होगा कि इमाम हुसैन अपने साथ ऐसे लोगों को लेकर कुफा जायेंगे जिन में औरतें , बूढ़े और दुधापीते बच्चे भी होंगे .उसने यह भी नहीं सोचा होगा कि मुसलमान जिस रसूल के नाम का कलमा पढ़ते हैं उसी के नवासे को परिवार सहित निर्दयता से क़त्ल कर देंगे .और यजीद इतना नीच काम करेगा . वह तो युद्ध की योजना बनाकर आया था . तभी रस्ते में ही खबर मिली कि इमाम हुसैन का क़त्ल हो गया . यह घटना 10 अक्टूबर 680 यानि 10 मुहर्रम 61 हिजरी की है .यह हृदय विदारक खबर पता चलते ही वहां के सभी हिन्दू( जिनको आजकल हुसैनी ब्राहमण कहते है ) मुख़्तार सकफी के साथ इमाम हुसैन के क़त्ल का बदला लेने को युद्ध में शामिल हो गए थे .इस घटना के बारे में "हकीम महमूद गिलानी" ने अपनी पुस्तक "आलिया " में विस्तार से लिखा है 
कर्बला की घटना को युद्ध कहना ठीक नहीं होगा ,एक तरफ तिन दिनों के प्यासे इमाम हुसैन के साथी और दूसरी तरफ हजारों की फ़ौज थी ,जिसने क्रूरता और अत्याचार की सभी सीमाएं पर कर दी थीं ,यहाँ तक इमाम हुसैन का छोटा बच्चा जो प्यास के मारे तड़प रहा था , जब उसको पानी पिलाने इमाम नदी के पास गए तो हुरामुला नामके सैनिक ने उस बच्चे अली असगर के गले पर ऐसा तीर मारा जो गले के पार हो गया . इसी तरह एक एक करके इमाम के साथी शहीद होते गए .

और अंत में शिम्र नामके व्यक्ति ने इमाम हुसैन का सी काट कर उनको शहीद कर दिया , शिम्र बनू उमैय्या का कमांडर था . उसका पूरा नाम "Shimr Ibn Thil-Jawshan Ibn Rabiah Al Kalbi (also called Al Kilabi 
(Arabic: شمر بن ذي الجوشن بن ربيعة الكلبي) 
था. यजीद के सैनिक इमाम हुसैन के शरीर को मैदान में छोड़कर चले गए थे .तब रिखब दत्त ने इमाम के शीश को अपने पास छुपा लिया था .यूरोपी इतिहासकार रिखब दत्त के पुत्रों के नाम इसप्रकार बताते हैं ,1सहस राय ,2हर जस राय 3,शेर राय ,4राम सिंह ,5राय पुन ,6गभरा और7 पुन्ना .बाद में जब यजीद को पता चला तो उसके लोग इमाम हुसैन का सर खोजने लगे कि यजीद को दिखा कर इनाम हासिल कर सकें . जब रिखब दत्त ने शीश का पता नहीं दिया तो यजीद के सैनिक एक एक करके रिखब दत्त के पुत्रों से सर काटने लगे ,फिर भी रिखब दत्त ने पता नहीं दिया .सिर्फ एक लड़का बच पाया था . जब बाद में मुख़्तार ने इमाम के क़त्ल का बदला ले लिया था तब विधि पूर्वक इमाम के सर को दफनाया गया था .यह पूरी घटना पहली बार कानपुर में छपी थी .story had first appeared in a journal (Annual Hussein Report, 1989) printed from Kanpur (UP) .The article ''Grandson of Prophet Mohammed (PBUH

रिखब दत्त के इस बलिदान के कारण उसे सुल्तान की उपाधि दी गयी थी .और उसके बारे में "जंग नामा इमाम हुसैन " के पेज 122 में यह लिखा हुआ है ,"वाह दत्त सुल्तान ,हिन्दू का धर्म मुसलमान का इमान,आज भी रिखब दत्त के वंशज भारत के अलावा इराक और कुवैत में भी रहते हैं ,और इराक में जिस जगह यह लोग रहते है उस जगह को आज भी हिंदिया कहते हैंयह विकी पीडिया से साबित है 

तबसे आजतक यह हुसैनी ब्राह्मण इमाम हुसैन के दुखों को याद करके मातम मनाते हैं .लोग कहते हैं कि इनके गलों में कटने का कुदरती निशान होता है .यही उनकी निशानी है .

Thursday, 15 August 2013

१५ अगस्त २०१३, भारत, एक नजर मे...

उपर आप जो चित्र देख रहे हैं, वो पहले के भारत का नक्क्षा है। यदि हम आज े भारत का नक्शा बनाएं तो आपको दुख होगा क्योंकि यह तो हमारे भारत का नक्शा नहीं है जो आजादी े समय हमें मिला था। आजादी बाद हजारों किलोमीटर के भारतीय भू-भाग पर चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश का कब्जा है, जिसे कभी भी भारत ने वापस लेने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया। जब आजादी के बाद जो हमें मिला उसे ही सहेज के नहीं रख नाए तो अखंड भारत वाली तो कल्पना ही छोड़ दीजिए। ऐसे लगता ै ि म धीरे-धीरे अपनी आजादो रहे हैं।
स्वतंत्रता दिवस विशेष : वेबदुनिया प्रस्तुति

आज भी भारत-पाक सीमा विवाद, भारत-चीन सीमा विवाद और भारत-बांग्लादेश सीमा विवाद हमारे गले की हड्डी बना हुआ है। चीन के साथ 1962 का युद्ध, पाकिस्तान के साथ 1947, 1965 और 1971 का युद्ध और 1999 के कारगिल का युद्ध हमें गहरे दर्द दे गया है। 


इस सबके बावजूद भारतीय नेतृत्व अपनी सीमाओं के प्रति सजग नहीं है और सीमाओं पर लगातार हो रही घुसपैठ ने सीमाओं पर खतरे को और बढ़ा दिया है। आजादी के बाद से भारत लगातार सीमाओं पर मार खाता रहा है। शहीदों की लिस्ट बढ़ती जा रही है और सरकार संसद में बहस करने में लगी है। पूरा देश बहस और बयान में उलझा है लेकिन कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है?

अरुणाचल, सिक्किम, लेह-लद्दाख, कश्मीर और अक्साई चिन के एक बहुत बड़े भू-भाग पर चीन का कब्जा है। भारत का नेतृत्व इस संबंध में कभी गंभीरता से कोई न तो वार्ता करता है और न ही कोई सैन्य कार्रवाई के लिए कदम उठाता है। सरकने की नीति के तहत चीन घुसता ही जा रहा है और भारतीय सेना चीन के आक्रमक रुख और भारतीय नेतृत्व के आगे बेबस है।

जवाहरलाल नेहरू के शासन में चीन ने 1962 में भारत पर अचानक आक्रमण कर दिया था तब भारतीय नेतृत्व को समझ में नहीं आया कि अब क्या करें। उस वक्त 'हिंदी चीनी भाई भाई' का नार देने वाले चीन के प्रधामंत्री चाऊ-एन-लाई ने नेहरू को धोखे में रखा और चुपके से चीनी सेना को भारतीय क्षेत्र में घुसने का आदेश दे दिया।
1962 भारत-चीन युद्ध का कारण : सन 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वर्ष 1959 में तिब्बत में हुए तिब्बती विद्रोह के बाद जब भारत ने दलाई लामा को शरण दी तो चीन भड़क गया और भारत-चीन सीमा पर हिंसक घटनाओं होना शुरू हो गई।
युद्ध का दूसरा कारण हिमालय क्षेत्र का सीमा विवाद था। भारत इस भ्रम में रहा कि सीमा का निर्धारण ब्रिटिश सरकार के समय सुलझा लिया गया है लेकिन चीन इससे इनकार करता रहा। भारत ने चीन की बातों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। इसके चलते चीन ने भारतीय सीमा के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र जम्मू-कश्मीर के लद्दाख वाले हिस्से के अक्साई-चिन और अरुणाचल प्रदेश के कई हिस्सों पर अपना दावा जताया। पंडित जवाहरलाल नेहरू और माओत्से तुंग के बीच कई वार्ताओं के बाद भी मसला नहीं सुलझा, जिसका परिणाम युद्ध के रूप में सामने आया।

भारत-चीन युद्ध : भारत-चीन युद्ध 20 अक्टूबर, 1962 को लड़ा गया था। दोनों देशों के बीच ये युद्ध करीब एक महीने तक चला, जिसमें भारत को हार का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में भारत ने अपनी वायुसेना का इस्तेमाल नहीं किया था, जिसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कड़ी आलोचना हुई। दूसरी ओर नेहरू चीन के सात नरमी से पेश आए जिसके चलते भारत को अपना बहुत बड़ा भू-भाग खोना पड़ा। 
 
चीनी सेना ने 20 अक्टूबर, 1962 को लद्दाख और पूर्वोत्तर में अरुणाचल के क्षेत्रों की पारम्परिक सीमा का उल्लंघन करते हुए 'मैकमोहन रेखा' के पार एक साथ हमले किए और पश्चिमी क्षेत्र में चुशूल में रेजांग-ला एवं पूर्व में त्वांग पर कब्जा कर लिया। कब्जे के बाद चीन की सेना ने 20 नवम्बर, 1962 को एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी।

भारत के यह चाहने के बावजूद कि एक निश्चित सीमांकन हो, चीन को ऐसी सीमा मंजूर नहीं थी। चीन का मन बदल गया और उसने युद्धविराम के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा को सीमा के रूप में घोषित कर दिया।
 
चीन ने लद्दाख और पूर्वोत्तर में अरुणाचल के क्षेत्रों की पारम्परिक सीमा का उल्लंघन किया। ये सीमाएं भी चीन के लिए पूरी तरह मान्य नहीं थीं। कोलंबो शक्तियों ने 1962 के युद्ध के बाद हस्तक्षेप किया और भारत तथा चीन दोनों को वहां से 26.5 मीटर पीछे जाने के लिए कहा, जहां उनकी सेनाएं खड़ी थीं। भारत इसी के अनुसार पीछे हट गया, लेकिन चीन नहीं हटा। उसकी सेनाओं ने अभी तक उन सीमाओं पर कब्जा कर रखा है।

त्वांग से 60 किमी की दूरी पर लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) है। यह अरुणाचल का हिस्सा है, लेकिन चीन लगातार अरुणाचल में घुसने का प्रयास करता रहा। अरुणाचल प्रदेश को अपने देश में सम्मिलित करने की कई बार कोशिश की है लेकिन राज्य की जनता के विरोध के चलते उसे अपने प्रयासों में सफलता नहीं मिल पाई है।

युद्ध में सेना का नुकसान : भारत-चीन युद्ध में 1383 भारतीय सैनिक मारे गए, जबकि 1047 घायल हुए। इसके अलावा 1700 सैनिक आज तक लापता हैं और 3968 सैनिकों को चीन ने गिरफ्तार कर लिया था। वहीं दूसरी ओर चीन के कुल 722 सैनिक मारे गए और 1697 घायल हुए। इस युद्ध में भारत की ओर से मात्र बारह हजार सैनिक चीन के 80 हजार सैनिकों से मुकाबला कर रहे थे।

अक्साई चिन : चीन जम्मू-कश्मीर के लद्दाख से अक्साई चिन तक तथा पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश को वह अपना हिस्सा मानता है। लगभग स्वीटजरलैंड के बराबर वाले भाग अक्साई चिन के कुछ हिस्सों पर चीन ने अधिकार कर रखा है जबकि यह भारत का हिस्सा है। उसने 1957 में अक्साई चिन में निर्माण कार्य भी किया जिसका पता भारत को करीब एक साल बाद चीन का नक्शा देखकर चला। चीन ने काराकोरम पास के जरिए तिब्बत और जिनसियांग प्रांत को जोड़ने वाले एकमात्र माग पर भी कब्जा कर लिया है।

अरुणाचल प्रदेश को उसने अपने कब्जे वाले तिब्बत का हिस्सा माना है। तिब्बत के साथ अंग्रेजों के शासनकाल में 1913-14 में सर हेनरी मैकमोहन के नेतृत्व में भारत का समझौता हुआ। 4057 मिटर की ऊंचाई वाली हिमालय की चोटियों पर चीन का नियंत्रण है। नीचे भारत की सैनाएं हैं।

1963 में पाकिस्तान ने चीन को कश्मीर का 4000 किलोमीटर का हिस्सा सौंप दिया था, जिस पर चीन ने कराकोरम हाइवे बनाया था। चीन की इस हाइवे के साथ ही रेलवे लाइन बनाने की योजना है। 

अक्साई चिन नामक क्षेत्र जो पूर्व जम्मू एवं कश्मीर राज्य का भाग था, पाक अधिकृत कश्मीर में नहीं आता है। ये 1962 से चीनी नियंत्रण में है। जम्मू एवं कश्मीर को अक्साई चिन क्षेत्र से अलग करने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा कहलाती है- LAC...

मैकमोहन रेखा : 1914 में शिमला में उस समय के ब्रिटिश भारत सम्राजय, तिब्बत और चीन के बीच तिब्बत की स्थिति को निर्धारित करने के लिए विवादित समझौता हुआ था। बाद में चीन इस बातचीत से हट गया था और इस समझौते की शर्तों को मानने से इंकार कर दिया था। इसी समझौते के तहत ब्रिटिश भारत और तिब्बत की सीमा को निर्धारित करने के लिये इस समझौते को कराने वाले ब्रिटिश सचिव सर मैकमोहन के नाम पर 890 किलोमीटर लम्बी मैकमोहन रेखा बनाई गई। भारत जहां इस रेखा को तिब्बत और चीन से अधिकारिक सीमा मानता है वहीं चीन इसे अवैध करार देता रहा है।
 
सर मैकमोहन ने भारत और तिब्बत के बीच 890 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा खींची। इसे मैकमोहन लाइन नाम दिया गया था। तिब्बत से 1959 में दलाई लामा के निर्वासन के बाद चीन तथा भारत के बीच तनाव बढ़ा और जिस चीन को 1951 में सबसे पहले भारत ने विश्व मंच पर राजनयिक मान्यता दी थी उसी ने 1962 में भारत के पंचशील जैसे शांति सिद्धांत को ठुकराते हुए भारत पर आक्रमण कर दिया।

भारत का कहना है कि विवादित क्षेत्र का क्षेत्रफल 4,000 किलोमीटर है जबकि चीन इसे 2,000 किलोमीटर बताता है। यह विवाद अरुणाचल प्रदेश में है जिसे चीन दक्षिणी तिब्बत कहता है।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर : यदि जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर के भारत में विलय की जिम्मेदारी सरदार पटेल को सौंपी होती तो आज संपूर्ण कश्मीर भारत का हिस्सा होता लेकिन नेहरू ने इस मामले को खुद हेंडल किया और हम देखते हैं कि इसका क्या परिणाम निकला। 

भारत की आजादी और विभाजन के दौरान पाकिस्तान ने कबाइलियों के माध्यम से कश्मीर के आधे हिस्से पर कब्जा कर लिया था जिसे आज पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता है। आजादी के 63 साल बाद भी भारत-पाकिस्तान के बीच यह मुद्दा बरकरार है।


पाक अधिकृत कश्मीर की सीमाएं पाकिस्तानी पंजाब एवं उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत से पश्चिम में, उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान के वाखान गलियारे से, चीन के जिन्जियांग उयघूर स्वायत्त क्षेत्र से उत्तर और भारतीय कश्मीर से पूर्व में लगती हैं। पाकिस्तान इसे आजाद कश्मीर कहता है, लेकिन यहां के मूल कश्मीरियों में शिया मुसलमानों और पंडितों को बाहर खदेड़ दिया गया है। अब वहां पाकिस्तानी लोग रहहैं जिनके सौ से अधिक आतंकी शिविर हैं।  
 
कश्मीर के उत्तरी इलाके पर पाकिस्तान का कब्जा है जिसे गिलगिट-बाल्टिस्तान का नाम दिया गया है। पाकिस्तान सरकार इस बात पर हमेशा अड़ी रही है कि 72,000 किलोमीटर का यह इलाका महाराजा हरि सिंह के राज्य जम्मू-कश्मीर का हिस्सा कभी नहीं था। पाकिस्तान 1935 की संधि का हवाला देते हुए कहता है कि महाराजा हरि सिंह ने इसे ब्रिटिश भारत को लीज पर 60 साल के लिए दिया था। लेकिन पाकिस्तान भूल जाता है कि माउंटबेटन ने इस संधि को आजादी से एक महीने पहले जुलाई 1947 में भंग कर दिया था और महाराजा हरि सिंह को गिलगिट सौंप दिया था। 

गिलगिट-बाल्टिस्तान (5,135 वर्ग मील) में लगभग 40 लाख लोग रहते हैं जिसमें पाकिस्तान के अन्य इलाकों से लाकर पाकिस्तानी लोग बसा दिए गए हैं। तथाकथित आजाद कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद है और इसमें 8 जिले, 19 तहसीलें और 182 संघीय काउंसिलें हैं।
 
आजाद कश्मीर के मीरपुर ‍िडवीजन में ज‍िला भिम्बर, ज‍िला कोटली और जिला मीरपुर, मुजफ्फराबाद ‍िडवीजन में जिला बाग, जिला मुजफ्फराबाद और जिला नीलम जबकि पुंछ रावलाकोट ‍डिवीजन में जिला पूंछ, रावलाकोट और जिला सुधनती शामिल हैं।


एलओसी पर लगातर घुसपैठ और राज्य तथा केंद्र शासन की उदासीनता के चलते भारत के भीतर द्रास-कारगिल की पहाड़ियों पर पाकिस्तानी सेना और मुजाहिदीन कब्जा करके बैठ गए थे। कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में नियंत्रण रेखा के पार घुसपैठ करने की साजिश के पीछे तत्कालीन पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख परवेज मुशर्रफ को जिम्मेदार माना जाता है। 
 
मई 1999 में एक लोकल ग्वाले से मिली सूचना के बाद बटालिक सेक्टर में ले. सौरभ कालिया के पेट्रोल पर हमले से उस इलाके में घुसपैठियों की मौजूदगी का पता चला। शुरू में भारतीय सेना ने इन घुसपैठियों को जिहादी समझा और उन्हें खदेड़ने के लिए कम संख्या में अपने सैनिक भेजे, लेकिन जवाबी हमले और एक के बाद एक कई इलाकों में घुसपैठियों के भारी संख्या में मौजूद होने और एक योजनाबद्ध ढंग से और बड़े स्तर पर की गई भारतीय सीमा पर कब्जा करने की रणनीति का पता चला। इस घुसपैठ ने भारतीय सेना और भारतीय नेतृत्व के कान खड़े कर दिए।

अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार ने सेना को आदेश दिए कि घुसपैठियों को किसी भी कीमत पर खदेड़ दिया जाए। आदेश पाकर भारतीय सेना ने शुरू किया 'ऑपरेशन विजय', जिसमें 30,000 भारतीय सैनिक शामिल थे।
 
भारतीय सेनाओं ने इस लड़ाई में पाकिस्तानी सेना तथा मुजाहिदीनों के रूप में उसके पिट्ठुओं को परास्त किया। दो महीने से ज्यादा चले इस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को मार भगाया था और आखिरकार 26 जुलाई को आखिरी चोटी पर भी जीत पा ली गई। यही दिन अब ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

माना जाता है कि भारत ने इस ‘ऑपरेशन विजय’ का जिम्मा प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से करीब 2 लाख सैनिकों को सौंपा था। जंग के मुख्य क्षेत्र कारगिल-द्रास सेक्टर में करीब 30 हजार सैनिक मौजूद थे। इस युद्ध के बाद पाकिस्तान के 357 सैनिक मारे गए, लेकिन बताया जाता है कि भारतीय सेना की कार्रवाई में उसके 4 हजार सैनिकों की जान गई। भारतीय सेना के 527 जवान शहीद हुए और 1,363 अन्य घायल हुए। विश्व के इतिहास में कारगिल युद्ध दुनिया के सबसे ऊंचे क्षेत्रों में लड़ी गई जंग की घटनाओं में शामिल है।

कारगिल युद्ध का कारण : आमतौर पर कारगिल युद्ध को भी 1947-48 तथा 1965 में पाकिस्तानी सेना द्वारा कबाइलियों की मदद से कश्मीर पर कब्जा करने की कोशिशों के तहत देखा जाता है। वास्तव में कारगिल युद्ध कश्मीर हथियाने और भारत को अस्थिर करने के जिहादियों के 20 वर्ष से जारी अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। कश्मीर के लिए पाकिस्तान का प्रॉक्सी वॉर जारी है।
भारत और बांग्लादेश मुक्ति मोर्चा ने मिलकर सन् 9171 में पाकिस्तान से बांग्लादेश को आजाद कराया। बांग्लादेश की आजादी के बाद भारत से लगी बांग्लादेश की सीमा का कभी अधिकृत तौर पर पुख्ता सीमांकन नहीं किया गया जिसके चलते दोनों देशों के बीच सीमा को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रही।

भारत के 5 राज्यों पश्चिम बंगाल, मेघालय, मिजोरम, असम और त्रिपुरा की 4,095 किलोमीटर लंबी सीमा बांग्लादेश के साथ जुड़ी हुई है।

पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल में कई स्थानों का सीमांकन नहीं हुआ है। पूर्वोत्तर की कुछ भूमि पर बांग्लादेश दावा करता रहा तो पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों को भी बांग्लादेश अपना हिस्सा बताता रहा जिसके चलते दोनों देशों के संयुक्त कार्यदल की कई वार्ताएं हुईं, लेकिन सीमा विवाद पर ध्यान देने के बजाय दोनों देशों ने व्यापार संबंधों पर विशेष ध्यान दिया जिसके चलते सीमा विवाद उपेक्षित बना रहा।

अगस्त 2011 में यह दावा किया गया कि दोनों देशों ने अपना सीमा विवाद सुलझा लिया है। भारत और बांग्लादेश ने 4,156 किलोमीटर लंबी अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा को अंतिम रूप दिया और नक्शों पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही दशकों से चल रहा सीमा विवाद सुलझ गया।

समाचार पत्र 'डेली स्टार' में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बांग्लादेश के उच्चायुक्त तारिक अहमद करीम एवं बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त राजीत मित्तर ने 1,149 नक्शों पर हस्ताक्षर किए।

सीमा निर्धारण दल के प्रमुख एवं संयुक्त गृह सचिव (राजनीतिक) कमाल उद्दीन अहमद ने कहा कि इनमें से आधे नक्शे बांग्लादेश में बनाए गए और शेष भारत में तैयार किए गए। बीडी न्यूज 24 डॉट कॉम के मुताबिक अहमद ने कहा, 'दोनों देशों के प्रतिनिधियों द्वारा जांच के बाद नक्शों को अंतिम रूप दिया गया।'

 
अहमद ने कहा कि दोनों देशों के उच्चायुक्त अब प्रत्येक नक्शे की 8 प्रतियों पर हस्ताक्षर करेंगे। मौजूदा सीमा को हालांकि दोनों देशों से मान्यता मिली हुई है, फिर भी नक्शों पर हस्ताक्षर हो जाने से यह कानूनी तौर पर पुख्ता हो जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच पूर्वोत्तर में 6.5 किलोमीटर लंबी पट्टी का सीमांकन होना अभी बाकी है। अहमद ने कहा कि दोनों देशों के प्रतिनिधि इस हिस्से के नक्शों को जल्द ही अंतिम रूप देंगे।

उल्लेखनीय है कि भारत और पूर्वी पाकिस्तान के बीच सीमांकन 1947 में शुरू हुआ था। सीमांकन के प्रारंभिक मसौदे पर 1956 में हस्ताक्षर किए गए थे। बाद में यह प्रक्रिया बंद कर दी गई थी। भारत के 111 क्षेत्र फिलहाल बांग्लादेश के अधीन हैं जिसमें 37,000 लोग रहते हैं। इसी तरह बांग्लादेश के 51 क्षेत्र भारत में पड़ते हैं जिसमें 14,000 लोग रहते हैं।