Sunday, 5 January 2014

मृत्यु

किसकी मृत्यु कैसे होगी? इन 3 लक्षणों से फौरन चलता है पता

किसकी मृत्यु कैसे होगी? इन 3 लक्षणों से फौरन चलता है पता
 हिन्दू धर्मशास्त्रों में न केवल जीवन के रहते अच्छे या बुरे कर्मों को सुख और दु:ख की वजह बताया गया है, बल्कि इन सद्कर्मों व दुष्कर्मों को सुखद व दु:खद मृत्यु नियत करने वाला भी बताया गया है। इसे दूसरे शब्दों में सद्गति व दुर्गति भी कहा जाता है। चूंकि मृत्यु अटल सत्य है, इसलिए हर ग्रंथ में हमेशा अच्छे गुण, विचार व आचरण को अपनाने की सीख दी गई है। 
खासतौर पर अक्सर कई लोगों की ऐसी प्रवृत्ति उजागर होती है कि वे ज़िंदगी को अच्छे कामों से संवारने की कोशिशों से बचते रहते हैं, किंतु मृत्यु को सुधारने की गहरी चाहत रखते हैं। मृत्यु से जुड़े कई रहस्य हिंदू धर्मशास्त्र गरुड़ पुराण में उजागर हैं। इसी कड़ी में जानिए मृत्यु से जुड़ी वे 3 खास बातें, जो बताती हैं कि किसकी मृत्यु कैसे होगी -  

हिन्दू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में जीवन में किए अच्छे-बुरे कामों के मुताबिक मृत्यु के वक्त कैसे हालात बनते हैं? इसके बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं बताया है। जानिए किस काम से कैसी मौत मिलती है?
- जो लोग सत्य बोलते हैं, ईश्वर में आस्था और विश्वास रखते हैं, विश्वासघाती नहीं होते, उनकी मृत्यु सुखद होती है। 

जो लोग दूसरों को आसक्ति, मोह का उपदेश देते हैं, अविद्या या अज्ञानता, द्वेष या स्वार्थ, लोभ की भावना फैलाते हैं, वे मृत्यु के समय बहुत ही कष्ट उठाते हैं। 
झूठ बोलने वाला, झूठी गवाही देने वाला, भरोसा तोडऩे वाला, शास्त्र व वेदों की बुराई करने वालों की दुर्गति सबसे ज्यादा होती है। उनकी बेहोशी में मृत्यु हो जाती है। 

यही नहीं ऐसे लोगों को लेने के लिए भयानक रूप और गंध वाले यमदूत आते हैं, जिसे देखकर जीव कांपने लगता है। तब वह माता-पिता व पुत्र को याद कर रोता है।

ऐसी हालात में वह चाहकर भी मुंह से साफ नहीं बोल पाता। उसकी आंखे घूमने लगती है। मुंह का पानी सूख जाता है, सांस बढ़ जाती है और अंत में कष्ट से दु:खी होकर प्राण त्याग देता है। मृत्यु को प्राप्त होते ही उसका शरीर सभी के लिए न छूने लायक और घृणा करने वाला बन जाता है।

Friday, 3 January 2014

जानिए शैव संप्रदाय की 11 खास बातें

शैव संप्रदाय के उप संप्रदाय : शैव में शाक्त, नाथ, दसनामी, नाग आदि उप संप्रदाय हैं। महाभारत में माहेश्वरों (शैव) के 4 संप्रदाय बतलाए गए हैं- शैव, पाशुपत, कालदमन और कापालिक।

कश्मीरी शैव संप्रदाय : कश्मीर को शैव संप्रदाय का गढ़ माना गया है। वसुगुप्त ने 9वीं शताब्दी के उतरार्ध में कश्मीरी शैव संप्रदाय का गठन किया। इससे पूर्व यहां बौद्ध और नाथ संप्रदाय के कई मठ थे।

वसुगुप्त के दो शिष्य थे कल्लट और सोमानंद। इन दोनों ने ही शैव दर्शन की नई नींव रखी। लेकिन अब इस संप्रदाय को मानने वाले कम ही मिलेंगे। 

वीरशैव संप्रदाय : वीरशैव एक ऐसी परंपरा है जिसमें भक्त शिव परंपरा से बंधा हो। यह दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय हुई है। यह वेदों पर आधारित धर्म है। यह भारत का तीसरा सबसे बड़ा शैव मत है, पर इसके ज्यादादातर उपासक कर्नाटक में हैं।

भारत के दक्षिण राज्यों महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, केरल और तमिलनाडु के अलावा यह संप्रदाय अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कश्मीर, पंजाब, हरियाणा में बहुत ही फला और फैला। इस संप्रदाय के लोग एकेश्वरवादी होते हैं।

तमिल में इस धर्म को शिवाद्वैत धर्म अथवा लिंगायत धर्म भी कहते हैं। उत्तर भारत में इस धर्म का औपचारिक नाम 'शैवा आगम' है। वीरशैव की सभ्यता को द्रविड़ सभ्यता भी कहते हैं।



FILE


कापालिक शैव : कापालिक संप्रदाय को महाव्रत-संप्रदाय भी माना जाता है। इसे तांत्रिकों का संप्रदाय माना गया है। नर कपाल धारण करने के कारण ये लोग कापालिक कहलाए। कुछ विद्वान इसे नहीं मानते हैं। उनके अनुसार कपाल में ध्यान लगाने के चलते उन्हें कापालिक कहा गया। पुराणों अनुसार इस मत को धनद या कुबेर ने शुरू किया था।

बौद्ध आचार्य हरिवर्मा और असंग के समय में भी कापालिकों के संप्रदाय विद्यमान थे। सरबरतंत्र में 12 कापालिक गुरुओं और उनके 12 शिष्यों के नाम सहित वर्णन मिलते हैं। गुरुओं के नाम हैं- आदिनाथ, अनादि, काल, अमिताभ, कराल, विकराल आदि। शिष्यों के नाम हैं- नागार्जुन, जड़भरत, हरिश्चन्द्र, चर्पट आदि। ये सब शिष्य तंत्र के प्रवर्तक रहे हैं। 


लकुलीश संप्रदाय : मध्यकाल के पूर्वार्द्ध में (6-10 शती) लकुलीश के पाशुपत मत और कापालिक संप्रदायों के होने का उल्लेख मिलता है। गुजरात में लकुलीश संप्रदाय का बहुत पहले ही प्रादुर्भाव हो चुका था। कालांतर में यह मत दक्षिण और मध्यभारत में फैला।

लकुलीश संप्रदाय या ‘नकुलीश संप्रदाय’ के प्रवर्तक ‘लकुलीश’ माने जाते हैं। लकुलीश को स्वयं भगवान शिव का अवतार माना गया है। लकुलीश सिद्धांत पाशुपतों का ही एक विशिष्ट मत है। यह संप्रदाय छठी से नौवीं शताब्दी के बीच मैसूर और राजस्थान में भी फैल चुका था।


आंध्र के कालमुख शैव : आज के प्रसिद्ध तिरुपति मंदिर में जो मूर्ति है (बालाजी या वेंकटेश्वर) व मूर्ति वीरभद्र स्वामी की है। कहा जाता है कि कृष्णदेवराय के काल में रामानुज आचार्य ने इस मंदिर का वैष्णवीकरण किया है और वीरभद्र की मूर्ति को बालाजी का नाम दिया गया, लेकिन यह कालमुख शिव संप्रदाय का स्थान था।


वारंगल 12वीं सदी में उत्कर्ष पर रहे आंध्रप्रदेश के काकतीयों की प्राचीन राजधानी था। वारंगल में 1162 में निर्मित 1,000 स्तंभों वाला शिव मंदिर शहर के भीतर ही स्थित है। कालमुख या आरध्य शैव के कवियों ने तेलुगु भाषाओं की अभूतपूर्व उन्नति की। शैव मत के अंतर्गत कालमुख संप्रदाय का यह उत्कर्ष काल था। वारंगल नरेश प्रतापरुद्र स्वयं भी तेलुगु का अच्छा कवि था।


तमिल शैव : वैसे समूचे तमिल क्षेत्र में शैव पंथियों के ही मठ और मंदिर थे। शिवपुत्र कार्तिकेय ने सबस पहले यहां शैव मत का प्रचार-प्रसार किया था। छठी से नौवीं शताब्दी के मध्य तमिल देश में उल्लेखनीय शैव भक्तों का जन्म हुआ, जो कवि भी थे। 

संत तिरुमूलर शिवभक्त तथा प्रसिद्ध तमिल ग्रंथ तिरुमंत्रम् के रचयिता थे। 

Wednesday, 25 December 2013

कैलाश मानसरोवर : एक साहसिक तीर्थयात्रा

सभी तीर्थ करने के बाद कैलाश मानसरोवर का तीर्थ करना हिंदू धर्म के अलावा जैन, बौद्ध और अन्य धर्म के श्रद्धालुओं में बहुत लोकप्रिय है। यह बहुत ही साहसिक तीर्थयात्रा है जिसकी शुरुआत सितंबर में की जाती है। उत्तराखंड तिब्बत होते हुए लगभग दो महीने में यह यात्रा पूरी होती है।

kailash-mansarovar

परिक्रमा का है महत्व
कैलाश पर्वतमाला कश्मीर से लेकर भूटान तक फैली हुई है। ल्हासा चू और झोंग चू के बीच पर्वत है जिसके उत्तरी शिखर का नाम कैलाश है। इस शिखर की आकृति शिवलिंग की तरह है। इसकी परिक्रमा का काफी महत्व बताया गया है। जो इसकी 108 परिक्रमा पूरी करते हैं उन्हें जन्म-मरण से मुक्ति मिल जाती है।

पुराना है इतिहास

कैलाश (तीर्थ) हिमालय के तिब्बत में स्थित एक तीर्थ है जिसे रजतगिरि भी कहते हैं। पौराणिक अनुश्रतियों के अनुसार शिव और ब्रह्माा आदि देवगण, मरीच आदि ऋषि और रावण, भस्मासुर आदि ने यहां तप किया था। पांडवों के दिग्विजय प्रयास के समय अर्जुन ने इस प्रदेश पर विजय प्राप्त की थी। इस प्रदेश की यात्रा व्यास, भीम, कृष्ण, दत्तात्रेय आदि ने की थी।

जैन धर्म में भी उल्लेख
जैन धर्म में भी इस स्थान का महत्व है। वे कैलाश को अष्टापद कहते हैं। कहा जाता है कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया था। बौद्ध साहित्य में मानसरोवर का उल्लेख अनवतप्त के रूप में हुआ है। उसे पृथ्वी पर स्थित स्वर्ग कहा गया है।

Tuesday, 24 December 2013

हिन्दू धर्म के शुभ रिवाज

हिन्दू धर्म में पूजा के समय कुछ बातें अनिवार्य मानी गई है। जैसे प्रसाद, मंत्र, स्वास्तिक, कलश, आचमन, तुलसी, मांग में सिंदूर, संकल्प, शंखनाद और चरण स्पर्श। 

आइए जानते हैं इनका क्या पौराणिक महत्व है : - 

प्रसाद क्यों चढ़ाया जाता है?

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे मनुष्य! तू जो भी खाता है अथवा जो भी दान करता नहै, होम-यज्ञ करता है या तप करता है, वह सर्वप्रथम मुझे अर्पित कर। प्रसाद के जरिए हम ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। इसके अलावा यह उसके प्रति आस्थावान होने का भी भाव है।

मंत्रों का महत्

देवता मंत्रों के अधीन होते हैं। मंत्रों के उच्चारण से उत्पन्न शब्द- शक्ति संकल्प और श्रद्धा बल से द्विगुणित होकर अंतर‍िक्ष में व्याप्त ईश्वरीय चेतना से संपर्क करती है और तब अंतरंग पिंड एवं बहिरंग ब्रह्मांड एक अद्भुत शक्ति प्रवाह उत्पन्न करते हैं, जो सिद्धियां प्रदान करती हैं।

जानिए, क्यों है पूजन में स्वस्तिक का महत्व 

गणेश पुराण में कहा गया है कि स्वस्तिक चिह्न भगवान गणेश का स्वरूप है, जिसमें सभी विघ्न-बाधाएं और अमंगल दूर करने की शक्ति है। आचार्य यास्क के अनुसार स्वस्तिक को अविनाशी ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। इसे धन की देवी लक्ष्मी यानी श्री का प्रतीक भी माना गया है।

ऋग्वेद की एक ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक भी माना गया है, जबकि अमरकोश में इसे आशीर्वाद, पुण्य, क्षेम और मंगल का प्रतीक माना गया है। इसकी मुख्यत: चारों भुजाएं चार दिशाओं, चार युगों, चार वेदों, चार वर्णों, चार आश्रमों, चार पुरुषार्थों, ब्रह्माजी के चार मुखों और हाथों समेत चार नक्षत्रों आदि की प्रतीक मानी जाती है। भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को कल्याणकारी माना गया है। सर्वत्र यानी चतुर्दिक शुभता प्रदान करने वाले स्वस्तिक में गणेशजी का निवास माना जाता है। यह मांगलिक कार्य होने का परिचय देता है।

मांगलिक कार्यों का कल
नवरात्रि में कलश स्थापित करने की विधि और शुभ मुहूर्त

धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। देवी पुराण के अनुसार मां भगवती की पूजा-अर्चना करते समय सर्वप्रथम कलश की स्थापना की जाती है। नवरा‍त्र पर मंदिरों तथा घरों में कलश स्थापित किए जाते हैं तथा मां दुर्गा की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। मानव शरीर की कल्पना भी मिट्टी के कलश से की जाती है। इस शरीररूपी कलश में प्राणिरूपी जल विद्यमान है। जिस प्रकार प्राणविहीन शरीर अशुभ माना जाता है, ठीक उसी प्रकार रिक्त कलश भी अशुभ माना जाता है। इसी कारण कलश में दूध, पानी, अनाज आदि भरकर पूजा के लिए रखा जाता है। धार्मिक कार्यों में कलश का बड़ा महत्व है।


FILE


आचमन तीन बार ही क्यों?

वेदों के मुताबिक धार्मिक कार्यों में तीन बार आचमन करने को प्रधानता दी गई है। कहते हैं कि तीन बार आचमन करने से शारीरिक, मानसिक और वाचिक तीनों प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और अनुपम अदृश्य फल की प्राप्ति होती है। इसी कारण प्रत्येक धार्मिक कार्य में तीन बार आचमन करना चाहिए।

FILE


तुलसी जगाए सौभाग्

जो व्यक्ति प्रतिदिन तुलसी का सेवन करता है, उसका शरीर अनेक चंद्रायण व्रतों को फल के समान पवित्रता प्राप्त कर लेता है। जल में तुलसीदल (पत्ते) डालकर स्नान करना तीर्थों में स्नान कर पवित्र होने जैसा है और जो व्यक्ति ऐसा करता है वह सभी यज्ञों में बैठने का अधिकारी होता है।

मांग में सिंदूर क्यों सजाती हैं विवाहिता?

मांग में सिंदूर सजाना सुहागिन स्त्रियों का प्रतीक माना जाता है। यह जहां मंगलदायम माना जाता है, वहीं इससे इनके रूप-सौंदर्य में भी निखार आ जाता है। मांग में सिंदूर सजाना एक वैवाहिक संस्कार भी है।

शरीर-रचना विज्ञान के अनुसार सौभाग्यवती स्त्रियां मांग में‍ जिस स्थान पर सिंदूर सजाती हैं, वह स्थान ब्रह्मरंध्र और अहिम नामक मर्मस्थल के ठीक ऊपर है। स्त्रियों का यह मर्मस्थल अत्यंत कोमल होता है।

इसकी सुरक्षा के निमित्त स्त्रियां यहां पर सिंदूर लगाती हैं। सिंदूर में कुछ धातु अधिक मात्रा में होता है। इस कारण चेहरे पर जल्दी झुर्रियां नहीं पड़तीं और स्त्री के शरीर में विद्युतीय उत्तेजना नियंत्रित होती है।

FILE


संकल्प की जरूर

धार्मिक कार्यों को श्रद्धा-भक्ति, विश्वास और तन्मयता के साथ पूर्ण करने वाली धारण शक्ति का नाम ही संकल्प है। दान एवं यज्ञ आदि सद्कर्मों का पुण्य फल तभी प्राप्त होता है, जबकि उन्हें संकल्प के साथ पूरा किया गया हो। कामना का मूल ही संकल्प है और यज्ञ संकल्प से ही पूर्ण होते हैं।

FILE


धार्मिक कार्यों में शंखना

अथर्ववेद के मुताबिक शंख अंतरिक्ष, वायु, ज्योतिर्मंडल और सुवर्ण से संयुक्त होता है। शंखनाद से शत्रुओं का मनोबल निर्बल होता है। पूजा-अर्चना के समय जो शंखनाद करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वह भगवान श्रीहरि के साथ आनंदपूर्वक रहता है। इसी कारण सभी धार्मिक कार्यों में शंखनाद जरूरी है।

FILE


क्यों है चरण स्पर्श की परंपरा 

चरण स्पर्श की क्रिया में अंग संचालन की शारीरिक क्रियाएं व्यक्ति के मन में उत्साह, उमंग, चैतन्यता का संचार करती हैं। यह अपने आप में एक लघु व्यायाम और यौगिक क्रिया भी है, जिससे मन का तनाव, आलस्य और मनो-मालिन्यता से मुक्ति भी मिलती है

Sunday, 10 November 2013

इस्लाम का भविष्य

इस्लाम का भविष्य क्या होगा ?

मुसलमान अक्सर अपनी बढ़ती जनसंख्या की डींगें मारते रहते है .और घमंड से कहते हैं कि आज तो हमारे 53 देश हैं .आगे चलकर इनकी संख्या और बढ़ेगी .इस्लाम दुनिया भर में फ़ैल जायेगा .विश्व ने जितने भी धर्म स्थापक हुए हैं ,सभी ने अपने मत के बढ़ने की कामना की है .लेकिन मुहम्मद एकमात्र व्यक्ति था जिसने इस्लाम के विभाजन ,तुकडे हो जाने और सिमट जाने की पहिले से ही भविष्यवाणी कर दी थी .यह बात सभी प्रमाणिक हदीसों में मौजूद है .
यदि कोई इन हदीसों को झूठ कहता है ,तो उसे मुहम्मद को झूठ साबित करना पड़ेगा .क्योंकि यह इस्लाम के भविष्य के बारे में है .सभी जानते हैं कि किसी आदर्श ,या नैतिकता के आधार पर नहीं बल्कि तलवार के जोर पर और आतंक से फैला है .इस्लाम कि बुनियाद खून से भरी है .और कमजोर है .मुहम्मद यह जानता था .कुरान में साफ लिखा है -

1-इस्लाम की बुनियाद कमजोर है
"कुछ ऐसे मुसलमान हैं ,जिन्होंने मस्जिदें इस लिए बनायीं है ,कि लोगों को नुकसान पहुंचाएं ,और मस्जिदों को कुफ्र करने वालों के लिए घात लगाने और छुपाने का स्थान बनाएं .यह ऐसे लोग हैं ,जिन्होंने अपनी ईमारत (इस्लाम )की बुनियाद किसी खाई के खोखले कगार पर बनायीं है ,जो जल्द ही गिरने के करीब है .फिर जल्द ही यह लोग जहन्नम की आग में गिर जायेंगे "सूरा -अत तौबा 9 :108 और 109

2 -इस्लाम से पहिले विश्व में शांति थी .यद्यपि इस्लाम से पूर्व भी अरब आपस में मारकाट किया करते थे ,लेकिन जब वह मुसलमान बन गए तो और भी हिंसक और उग्र बन गए .जैसे जैसे उनकी संख्या बढ़ती गयी उनका आपसी मनमुटाव और विवाद भी बढ़ाते गए .वे सिर्फ जिहाद में मिलने वाले माल के लिए एकजुट हो जाते थे .फिर किसी न किसी बात पर फिर लड़ने लगते थे ,शिया सुनी विवाद इसका प्रमाण है .

इसके बारे में मुहमद के दामाद हजरत अली ने अपने एक पत्र में मुआविया को जो लिखा है उसका अरबी के साथ हिंदी और अंगरेजी अनुवाद दिया जा रहा है -

3 -हजरत अली का मुआविया को पत्र

हजरत अली का यह पत्र संख्या 64 है उनकी किताब" नहजुल बलाग "में मौजूद है .
http://www.imamalinet.net/EN/nahj/nahj.htm

"यह बात बिलकुल सत्य है कि,इस्लाम से पहिले हम सब एक थे .और अरब में सबके साथ मिल कर शांति से रह रहे थे .तुमने (मुआविया )महसूस किया होगा कि ,जैसे ही इस्लाम का उदय हुआ ,लोगों में फूट और मनमुटाव बढ़ाते गए .इसका कारण यह है ,कि एक तरफ हम लोगों को शांति का सन्देश देते रहे ,और दूसरी तरफ तुम मुनाफिक(Hypocryt )ही बने रहे ,और इस्लाम के नाम पर पाखंड और मनमर्जी चलाते रहे.तुमने अपने पत्र में मुझे तल्हा और जुबैर की हत्या का आरोपी कहा है .मुझे उस पर कोई सफ़ाई देने की जरुरत नहीं है .लेकिन तुमने आयशा के साथ मिलकर मुझे मदीना से कूफा और बसरा जाने पर विवश कर दिया ,तुमने जो भी आरोप लगाये हैं ,निराधार है ,और मैं किसी से भी माफ़ी नहीं मांगूंगा "
मुआविया के पत्र का हजरत अली का मुआविया को जवाब -नहजुल बलाग -पत्र संख्या 64

ومن كتاب له عليه السلام
كتبه إلى معاوية، جواباً عن كتاب منه
أَمَّا بَعْدُ، فَإِنَّا كُنَّا نَحْنُ وَأَنْتُمْ عَلَى مَا ذَكَرْتَ مِنَ الاَُْلْفَةِ وَالْجَمَاعَةِ، فَفَرَّقَ بيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ أَمْسِ أَنَّا آمَنَّا وَكَفَرْتُمْ، وَالْيَوْمَ أَنَّا اسْتَقَمْنَا وَفُتِنْتُمْ، وَمَا أَسْلَمَ مُسْلِمُكُمْ إِلاَّ كَرْهاً وَبَعْدَ أَنْ كَانَ أَنْفُ الاِِْسْلاَمِكُلُّهُ لِرَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وآله حرباً
وَذَكَرْتَ أَنِّي قَتَلْتُ طَلْحَةَ وَالزُّبَيْرَ، وَشَرَّدْتُ بِعَائِشَةَ وَنَزَلْتُ بَيْنَ الْمِصْرَيْنِ وَذلِكَ أَمْرٌ غِبْتَ عَنْهُ، فَلاَ عَلَيْكَ، وَلاَ الْعُذْرُ فِيهِ إِلَيْكَ

[ A reply to Mu'awiya's letter. ]

It is correct as you say that in pre-Islamic days we were united and at peace with each other. But have you realized that dissensions and disunity between us started with the dawn of Islam. The reason was that we accepted and preached Islam and you remained heathen. The condition now is that we are faithful and staunch followers of Islam and you have revolted against it. Even your original acceptance was not sincere, it was simple hypocrisy. When you saw that all the big people of Arabia had embraced Islam and had gathered under the banner of the Holy Prophet (s) you also walked in (after the Fall of Makkah.)

In your letter you have falsely accused me of killing Talha and Zubayr, driving Ummul Mu'minin Aisha from her home at Madina and choosing Kufa and Basra as my residence. Even if all that you say against me is correct you have nothing to do with them, you are not harmed by these incidents and I have not to apologize to you for any of them.

4 -इस्लाम का विभाजन

इस्लाम के पूर्व से ही अरब के लोग दूसरों को लूटने और आपसी शत्रुता के कारण लड़ते रहते थे .लेकिन मुसलमान बन जाने पर उनको लड़ने और हत्याएं करने के लिए धार्मिक आधार मिल गया .वह अक्सर अपने विरोधियों को मुशरिक ,मुनाफिक और काफ़िर तक कहने लगे और खुद को सच्चा मुसलमान बताने लगे .और अपने हरेक कुकर्मों को कुरान की किसी भी आयत या किसी भी हदीस का हवाला देकर जायज बताने लगे .धीमे धीमे सत्ता का विवाद धार्मिक रूप धारण करता गया .मुहम्मद की मौत के बाद ही यह विवाद इतना उग्र हो गया की मुसलमानों ने ही मुहम्मद के दामाद अली ,और उनके पुत्र हसन हुसैन को परिवार सहित क़त्ल कर दिया .उसके बाद ही इस्लाम के टुकडे होना शुरू हो गए .जिसके बारे में खुद मुहम्मद ने भविष्यवाणी की थी .-

"अबू हुरैरा ने कहा कि,रसूल ने कहा था कि यहूदी और ईसाई तो 72 फिरकों में बँट जायेंगे ,लेकिन मेरी उम्मत 73 फिरकों में बँट जाएगी ,और सब आपस में युद्ध करेंगे "अबू दाऊद-जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4579

"अबू अमीर हौजानी ने कहा कि ,रसूल ने मुआविया बिन अबू सुफ़यान के सामने कहा कि ,अहले किताब (यहूदी ,ईसाई ) के 72 फिरके हो जायेंगे ,और मेरी उम्मत के 73 फिरके हो जायेंगे ..और उन में से 72 फिरके बर्बाद हो जायेंगे और जहन्नम में चले जायेंगे .सिर्फ एक ही फिरका बाकी रहेगा ,जो जन्नत में जायेगा "अबू दाऊद -जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4580 .

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,ईमान के 72 से अधिक टुकडे हो जायेंगे ,और मुसलमानों में ऐसी फूट पड़ जाएगी कि वे एक दुसरे कीहत्याएं करेंगे ."
अबू दाऊद -जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4744 .

"अरफजः ने कहा कि मैं ने रसूल से सुना है ,कि इस्लाम में इतना बिगाड़ हो जायेगा कि ,मुसलमान एक दुसरे के दुश्मन बन जायेंगे ,और तलवार लेकर एक दुसरे को क़त्ल करेंगे "अबू दाऊद -जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4153 .

"सईदुल खुदरी और अनस बिन मालिक ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,पाहिले तो मुसलमान इकट्ठे हो जायेंगे ,लेकिन जल्द ही उनमें फूट पड़ जाएगी .जो इतनी उग्र हो जाएगी कि वे जानवरों से बदतर बन जायेगे .फिर केवल वही कौम सुख से जिन्दा रह सकेगी जो इनको इन को ( नकली मुसलमानों )को क़त्ल कर देगी .फिर अनस ने रसूल से उस कौम की निशानी पूछी जो कामयाब होगी .तो रसुलने बताया कि,उस कौम के लोगों के सर मुंडे हुए होंगे .और वे पूरब से आयेंगे "अबू दाऊद-जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4747 .

5 -इस्लाम के प्रमुख फिरके

आमतौर पर लोग मुसलमानों के दो ही फिरकों शिया और सुन्नी के बारे में ही सुनते रहते है ,लेकिन इनमे भी कई फिरके है .इसके आलावा कुछ ऐसे भी फिरके है ,जो इन दौनों से अलग है .इन सभी के विचारों और मान्यताओं में इतना विरोध है की यह एक दूसरे को काफ़िर तक कह देते हैं .और इनकी मस्जिदें जला देते है .और लोगों को क़त्ल कर देते है .शिया लोग तो मुहर्रम के समय सुन्नियों के खलीफाओं ,सहबियों ,और मुहम्मद की पत्नियों आयशा और हफ्शा को खुले आम गलियां देते है .इसे तबर्रा कहा जाता है .इसके बारे में अलग से बताया जायेगा .

सुन्नियों के फिरके -हनफी ,शाफई,मलिकी ,हम्बली ,सूफी ,वहाबी ,देवबंदी ,बरेलवी ,सलफी,अहले हदीस .आदि -

शियाओं के फिरके -इशना अशरी ,जाफरी ,जैदी ,इस्माइली ,बोहरा ,दाऊदी ,खोजा ,द्रुज आदि

अन्य फिरके -अहमदिया ,कादियानी ,खारजी ,कुर्द ,और बहाई अदि

इन सब में इतना अंतर है की ,यह एक दुसरे की मस्जिदों में नमाज नहीं पढ़ते .और एक दुसरे की हदीसों को मानते है .सबके नमाज पढ़ने का तरीका ,अजान ,सब अलग है .इनमे एकता असंभव है .संख्या कम होने के से यह शांत रहते हैं ,लेकिन इन्हें जब भी मौका मिलाता है यह उत्पात जरुर करते हैं .

6 -इस्लाम अपने बिल में घुस जायेगा

मुहम्मद ने खुद ही इस्लाम की तुलना एक विषैले नाग से की है .इसमे कोई दो राय नहीं है .सब जानते हैं कि यह इस्लामी जहरीला नाग कितने देशों को डस चुका है .और भारत कि तरफ भी अपना फन फैलाकर फुसकार रहा है .लेकिन हम हिन्दू इतने मुर्ख हैं कि सेकुलरिज्म ,के नामपर ,और झूठे भाईचारे के बहाने इस इस्लामी नाग को दूध पिला रहे हैं .और तुष्टिकरण की नीतियों को अपना कर आराम से सो रहे है .आज इस बात की जरुरत है की ,हम सब मिल कर मुहम्मद की इस भविष्यवाणी को सच्चा साबित करदें ,जो उसने इन हदीसों में की थीं .-

"अबू हुरैरा ने कहा की ,रसूल ने कहा कि,निश्चय ही एक दिन इस्लाम सारे विश्व से निकल कर कर मदीना में में सिमट जायेगा .जैसे एक सांप घूमफिर कर वापिस अपने बिल में घुस जाता है 'बुखारी -जिल्द 3 किताब 30 हदीस 100 .

"अब्दुल्ला बिन अम्र बिन यासर ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,जल्द ही एक ऐसा समत आयेगा कि जब लोग कुरान तो पढेंगे ,लेकिन कुरान उनके गले से आगे कंधे से निचे नहीं उतरेगी.और इस्लाम का कहीं कोई निशान नहीं दिखाई देगा "

बुखारी -जिल्द 9 किताब 84 हदीस 65

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने कहा है कि ,इस्लाम सिर्फ दो मस्जिदों (मक्का और मदीना )के बीच इस तरह से रेंगता रहेगा जैसे कोई सांप इधर उधर दो बिलों के बीच में रेंगता है "

सही मुस्लिम -किताब 1 हदीस 270 .

"इब्ने उमर ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ऐसा निकट भविष्य में होना निश्चय है ,कि इस्लाम और ईमान दुनिया से निकलकर वापस मदीने में इस तरह से घुस जायेगा ,जैसे कोई विषैला सांप मुड़कर अपने ही बिल में घुस जाता है "

सही मुस्लिम -किताब 1 हदीस 271 और 272 .

अब हम देखते हैं कि मुसलमान इन हदीसों को झूठ कैसे साबित करते है . आज लीबिया ,यमन और दूसरे इस्लामी देशों में जो कुछ हो रहा है ,उसे देखते हुए यही प्रतीत होता है कि मुहम्मद साहिब की यह हदीसें एक दिन सच हो जायेगीं ,जिनमे इस्लाम के पतन और विखंडन की भविष्यवाणी की गयी है .!


http://www.faithfreedom.org/oped/AbulKasen50920.htm

महिलाओं के लिए नर्क से भी बदतर है सऊदी अरब !

महिलाओं के अधिकारों के प्रति सऊदी अरब हमेशा से ही कट्टर रहा है। लेकिन पिछले हफ्ते वहां महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा और अन्य दुर्व्‍यवहार पर प्रतिबंध लगाने के एक उद्देश्‍य से एक कानून लागू किया गया। महिलाओं के रहने के लिहाज से सबसे ज्यादा खराब देश में यह कानून एक बड़ा बदलाव हो सकता है। लेकिन वाकई सऊदी महिलाएं पुरुष साथी के खिलाफ घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज करा सकेंगी, इस बारे में अभी भी कुछ कहना मुश्किल है। यह कानून उनके देश में मुक्ति का पहला कदम ही है। अभी भी यहां सिर्फ 10 साल की उम्र में बच्चियों की शादी करा देने और बलात्कार पर बेवकूफी भरा कानून अस्तित्व में हैं। कुछ ऐसे ही कानूनों के बारे में आगे पढ़ें...
पुरुष सत्तात्मक समाज
४० साल के ऊपर की फातिमा रियाद में रहती है। वह तब तक प्लेन में बैठ नहीं सकती, जब तक उसके पास अपने बेटे द्वारा लिखित अनुमति नहीं होगी।  रूढ़िवादी सऊदी अरब में महिला का अपना कोई जीवन नहीं होता। कानूनी रूप बालिग होने बावजूद भी महिलाओं का कोई अस्तित्व नहीं है। सऊदी में प्रत्येक महिला का पुरुष अभिभावक होना चाहिए। इसमें उसके पिता से लेकर अंकल, भाई, बेटे होते हैं।
किसी भी सऊदी महिला को पढ़ाई, काम, यात्रा, शादी और यहां तक चिकित्सीय जांच के लिए भी पुरुषों से लिखित अनुमति लेनी पड़ती है। इसके अलावा बिना किसी भी पुरुष अभिभावक वे केस फाइल नहीं कर सकती और न्याय की बात तो भूल ही जाइए।
बाल-विवाह
१२ साल की फातिमा को उसके पिता ने ५० साल अधेड़ आदमी को शादी के लिए बेच दिया। इस आदमी की पहले से ही बीवी और १० बच्चे थे। फातिमा उसके चंगुल से छूटने में सफल रही और अंतत: उसने फरवरी २०१३ में तलाक ले लिया। एक मानवाधिकार संगठन ने उसका केस लड़ा था। सऊदी अरब में छोटी सी उम्र में ही लड़कियों को बेच कर उनकी शादी ७०-८० साल के पुरुषों से कराने का चलन है। रियाद स्थित इमाम मोहम्मद बिन सऊद इस्लामिक यूनिवर्सिटी के प्रो. ग्रांड मुफ्ती शेख अब्दुल अजीज अल शेख का मानना है कि लड़किया १० से १२ साल की उम्र में शादी के लिए तैयार हो जाती हैं। २५ साल की उम्र में शादी करने वाली लड़कियां सबसे बड़ी गलती करती हैं। हाल के सालों में मुल्क में शादी के लिए उम्र बढ़ाने को लेकर काफी दबाव बन रहा है।
बलात्कार का कानून
साल २००७ की बात थी। सऊदी अरब की एक कोर्ट ने गैंगरेप की शिकार पीड़ित को छह महीने कैद और २०० कोड़े मारने का आदेश सुनाया था। इसके अलावा उसे ९० कोड़े मारने की सजा भी अलग से इसलिए सुनाई गई, क्योंकि वह कार में  पराए मर्द के साथ थी। इसमें भी महिला को ही दोषी माना गया।
यहां लड़कियों को बालिग होने से पहले ही शादी करा दी जाती है और उन्हें हिजाब में रहना पड़ता है। बावजूद इसके यहां रेप की संख्या सबसे ज्यादा है। इसका जिम्मेदार बलात्कार के कानून को माना जाता है। हालांकि सऊदी में शरिया कानून में रेप के लिए सजा का प्रावधान है। पत्नी के साथ रेप को अपराध नहीं माना जाता है। बलात्कार के लिए किसी आरोपी को तब तक सजा नहीं दी जा सकती जब तक उसके चार प्रत्यक्षदर्शी न हों।
विदेशी महिला कामगारों के लिए देश में कोई कानून नहीं हैं। इसलिए उनके साथ सबसे ज्यादा ज्यादती की जाती है। इसके अलावा रेप की रिपोर्टिग करना प्रतिबंधित है। महिला के पराए मर्द के साथ रिश्ते रखने पर मर्द से कुछ नहीं कहा जाता है। महिला को इसके लिए उचित सजा का प्रावधान है।
शिक्षा पर पाबंदीयां
२०११ की बात है। महत्वकांक्षी सुसान अली अल देमिनी अमेरिका में पढ़ाई करना चाहती थी। सुसान के इस फैसले को उनके पिता का सपोर्ट था, लेकिन वह दाखिला नहीं ले सकी। सऊदी अरब की हायर एजुकेशन कानून के मुताबिक सरकारी स्कॉलरशिप पर विदेश में पढ़ाई करने के दौरान लड़की के साथ पुरुष अभिभावक का होना ज़रूरी है। जबकि सुसान के साथ उनके माता-पिता दोनों ही जाने को तैयार थे, लेकिन उनके पिता को देश से बाहर जाने से रोक दिया गया और नियमों के मुताबिक मां का जाना गैरकानूनी था।
सऊदी अरब में एजुकेशन सिस्टम लैंगिक भेदवाव पर आधारित है। पुरुषों के मुताबिक महिलाओं को कम सुविधाएं मुहैया करवाई जाती हैं। सऊदी ऑफिशियल पॉलिसी के मुताबिक, वहां लड़कियों को केवल इसलिए पढ़ाया जाता है ताकि वे पारंपरिक इस्लामिक ढंग से अपनी जिम्मेदारियां निभा सकें। बीमारी की हालत में भी लड़कियां संस्थान कैंपस तब तक नहीं छोड़ सकती हैं, जब तक पुरुष अभिभावक की इजाजत ना हो।
नौकरी पर पाबंदीयां
मनर सऊद ने इस साल मई में विनचेस्टर यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री ऑग्रेनाइजेशनल लीडरशिप में हासिल की थी। उन्हें सऊदी सरकार की ओर से स्कॉलरशिप मिली। बावजूद इसके उसके पास कोई नौकरी नहीं हैं। सऊदी सरकार महिलाओं की शिक्षा के लिए काफी पैसे खर्च करती है। लेकिन उनकी नौकरी की कोई व्यवस्था नहीं की जाती है। ५७ फीसदी महिलाओं के पास यूनिवर्सिटी की डिग्री है। ७८ फीसदी के पास स्नातक और ६० फीसदी पीएचडी डिग्री वाली महिलाएं बेरोजगार हैं। दरअसल, सऊदी अरब पुरुष साथी के साथ काम करने, साक्षात्कारों से बचने के लिए नौकरी नहीं दी जाती है।
परिणाम स्वरूप सऊदी महिला पुरुषों के मुकाबले ज्यादा पढ़ी लिखी हैं। २००९ में महिला ग्रेजुएट की संख्या ५९,९४८ थी, जबकि ५५, ८४२ पुरुष ग्रेजुएट थे।
कार चलाने पर पाबंदी
२००८ में वाजेहा अल-हुवैदर का नाम दुनिया में मशहूर हो गया। वह सऊदी अरब की पहली महिला थी, जिसने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर खुद के कार चलाने का वीडियो यूटच्यूब पर पोस्ट किया था। सऊदी अरब में महिलाओं के कार चलाने पर पाबंदी है।
पांच साल बाद अब थोड़ा परिवर्तन आया है। महिलाओं को प्राइवेट ड्राइवर और पुरुष रिश्तेदार के निगरानी में कार चलाने की इजाजत दी जा चुकी है। कई बार पुलिस महिलाओं को गाड़ी चलाते हुए रोक लेती है और उनसे शपथ पत्र लिखवाती हैं कि वह कभी गाड़ी नहीं चलाएंगी। कई बार उन्हें कोड़े मारने की सजा भी दी जाती है। अप्रैल में सऊदी अरब ने महिलाओं के साइकिल और मोटरसाइकिल न चलाने के कानून पर पाबंदी हटा ली है।
खेलों और जिम पर पाबंदी
पिछले साल लंदन ओलिंपिक में दो सऊदी महिला एथलीटों को अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति के दबाव में भेजना पड़ा। इससे पहले सऊदी अरब पुरुष खिलाड़ियों को ही भेजता था। हालांकि फीमेल एथलीटों का प्रसारण सऊदी टीवी पर नहीं किया गया था। सऊदी लड़कियों को खेलों और जिम जाने देने की इजाजत नहीं है। प्रिंसेस नोरा बिंत अब्दुल रहमान यूनिवर्सिटी महिलाओं की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी है, जिसमें स्वीमिंग पूल, टेनिस कोर्ट और एक्सरसाइज एरिए की सुविधा है। इसके अलावा कोई भी यूनिवर्सिटी ऐसा सुविधा नहीं देती।
फीमेल एथलीट किसी भी स्पोर्ट्स क्लब में रजिस्टर नहीं करा सकती। नेशनल ट्रायल में उनके लिए पाबंदी है। मई २०१३ में शरिया कानून और ड्रेसकोड के साथ प्राइवेट स्कूल में स्पोर्ट्स एक्टिविटी की इजाजत दी गई है।
कुछ ऐसे कानून
अरब क्रांति के बाद किंग अब्दुला ने कुछ कानून में सुधार किया है। इसमें महिलाओं के अधिकार ज्यादा हैं।  उन्होंने २०१५ के म्युनिसिल चुनावों में फीमेल वोटिंग को इजाजत दी है। जनवरी में उन्होंने पहली महिला सदस्य को सलाहकार परिषद में जगह दी है। वहीं, १५० सदस्यों वाली एडवायजरी बॉडी में ३० महिला शामिल हैं। २००९ में पहला एकीकृत कोएड यूनिवर्सिटी और देश की पहली महिला मंत्री नियुक्त की गई थीं। महिलाएं अब अंत:वस्त्र और मेकअप शॉप, सुपर मार्केट और रेस्त्रा काम कर सकती हैं।

Friday, 8 November 2013

संन्यासी, हिंदू धर्म के उद्धारक या संहारक?

FILE
।।।वेदों में कहा गया है कि नदी के किनारे लगे वृक्ष को जिस तरह सभी तरह के पोषक तत्व मिलते रहते हैं उसी तरह सुख और दुख सभी अवस्था में जो व्यक्ति परमेश्वर (ब्रह्म) को पकड़कर रखता है वह कभी मुर्झाता नहीं है। दुखों को दूर करने की एक ही औषधि है- 'कायम रहना काम पर और पक्का रहना परमेश्वर पर।।'

वैदिक काल में संत को ऋषि-मुनि कहा जाता था। ये सभी ऋषि या मुनि अरण्य या हिमालय में अपने-अपने आश्रम में रहकर तप करते थे। इसे तपोभूमि भी कहा जाता था। संसार से ये संत कटे हुए रहते थे और यम-नियम का पालन करते हुए कठित तप-योग करते थे। कुंभ या चातुर्मास के दौरान ही संत सांसारिक जीवन में आकर समाज के हाल-चाल जानते थे। इस दौरान संत लोगों से कुछ लेते नहीं थे बल्कि उन्हें कुछ देकर ही जाते थे। इसके अलावा जिन लोगों को दीक्षा देना होती उन्हें वे साथ लेकर चले जाते थे। 

चार आश्रम को जानिए

हमारे ऋषि-मुनियों ने चार आश्रम की स्थापना की- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। ये आश्रम इसलिए स्थापित किए ताकि गृहस्थ और संन्यासी में फर्क किया जा सके, लेकिन आजकल गृहस्थ ही खुद को संन्यासी या संत मानने लगे हैं। वे सभी सुख-सुविधाओं के बीच रहकर उन्हें भोगते हुए खुद को संत या संन्यासी बताते हैं। लोग ऐसे तथाकथित संतों से दीक्षा लेकर उन्हें अपना गुरु मानते हैं। ये ऐसे गुरु घंटाल हैं कि लोगों को देते कुछ नहीं बल्कि लोगों के पास जो है उसे भी छीन लेते हैं। निर्मल बाबा दसवंत के नाम पर छीनते हैं तो आसाराम करोड़ों का दान लेकर।

धार्मिक टीवी चैनलों पर आने वाले तथाकथित साधु, ज्योतिष या भ्रमित करने वाली पुस्तकें लोगों को अनेक मंत्र, देवता आदि के बारे में बताते और डराते रहते हैं किंतु ये सभी भटकाव के रास्ते हैं। भ्रम-द्वंद्व, डर में जीने वाला या भटका हुआ व्यक्ति कभी भी कहीं भी नहीं पहुंच पाता। वह कभी किसी मंत्र या देवता का सहारा लेता है तो कभी किसी दूसरे मंत्र या देवता का। ऐसा व्यक्ति किनारे से दूर होता जाता है और हमेशा द्वंद्व और दुविधा में रहकर जीवन नष्ट कर लेता है।


पिछले कई वर्षों में हिन्दुत्व को लेकर व्यावसायिक संतों, ज्योतिषियों और धर्म के तथाकथित संगठनों और राजनीतिज्ञों ने हिन्दू धर्म के लोगों को पूरी तरह से गफलत में डालने का जाने-अनजाने भरपूर प्रयास किया, जो आज भी जारी है। हिन्दू धर्म की मनमानी व्याख्या और मनमाने नीति-नियमों के चलते खुद को व्यक्ति एक चौराहे पर खड़ा पाता है। समझ में नहीं आता कि इधर जाऊं या उधर।

भ्रमित समाज लक्ष्यहीन हो जाता है। लक्ष्यहीन समाज में मनमाने तरीके से परंपरा का जन्म और विकास होता है, जो कि होता आया है। मनमाने मंदिर बनते हैं, मनमाने देवता जन्म लेते हैं और पूजे जाते हैं। मनमानी पूजा पद्धति, त्योहार, चालीसाएं, प्रार्थनाएं विकसित होती हैं। व्यक्ति पूजा का प्रचलन जोरों से पनपता है। भगवान को छोड़कर संत, कथावाचक या पोंगा-पंडितों को पूजने का प्रचलन बढ़ता है।

वर्तमान दौर में अधिकतर नकली और ढोंगी संतों और कथावाचकों की फौज खड़ी हो गई है। धर्म को पूरी तरह अब व्यापार में बदल दिया गया है। धार्मिक चैनलों को देखकर जरा भी अध्यात्म की अनुभूति नहीं होती। सभी पोंगा-पंडित अपने अपने प्रॉडक्ट लेकर आ जाते हैं। अजीब-अजीब तरह के तर्क देते हैं और धर्म की मनमानी व्याखाएं करते हैं।


GOV
इन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के पहवाने और व्यवहार को देखकर दुख होता है कि इन्होंने धर्म का सत्यानाश कर दिया है। कोई इन्हें रोकने वाला नहीं है, क्योंकि हम लोकतंत्र में जी रहे हैं। इनकी अजीब तरह की हरकतों को देखकर लगता है कि कौन विश्वास करेगा धर्म पर? ये फूहड़ तरीके से नाचते हैं, जैसे कि आसारामजी नाचते थे। आजकल वे जेल में जप करते होंगे।

लाखों ज्योतिषियों की फौज है, जो मनगढ़ंत तरीके से भविष्य बताते हैं। अभी तो टीवी चैनल पर एक लाल किताब का विशेषज्ञ भी बाबा बन बैठा है, जो भविष्य में ज्योतिष का महल खड़ा करना चाहता है। ऐसा महल जिसके नीचे धर्म भी हो। एक भव्य महल यानी अब हिन्दू जनता नए तरीके से भटकेगी और नए तरीके से डरेगी। अधिकतर हिंदुओं का जीवन तो ग्रह-नक्षत्र ही तय करते हैं- भगवान नहीं, ईश्वर नहीं। ग्रह-नक्षत्रों से डरने वालों की एक अलग ही जमात है, ये क्या भक्ति करेगी? ये नए तरीके से समाज को दूषित करेंगे।

तरह-तरह के लक्ष्मी यंत्र, कुबेर यंत्र बेचे जा रहे हैं। कैसा भी दुख हो उसे दूर करने के उपाय बताए जा रहे हैं। हिन्दू धर्म के नाम पर तरह-तरह के अंधविश्‍वास फैलाए जा रहे हैं और लोगों को हर तरफ से डराकर उनके मन में द्वंद्व और दुविधा डालकर उनसे मोटी रकम ऐंठी जा रही है। इनके प्रचार-प्रसार के चलते जनता पहले की अपेक्षा अब ज्यादा अंधविश्वासी हो चली है। समाज भयभीत रहने लगा है।

सवाल यह उठता है कि क्या इन्हें रोकने के लिए हिन्दू संत समाज के संत कोई कदम क्यों नहीं उठाते? 


FILE
संतों के चमचे : हिन्दू जनता भी भ्रमित है। इसे भोली-भाली जनता कहना उचित नहीं होगा। यह जनता जानते-बूझते हुए भी किसी न किसी बाबा या ज्योतिषी के चक्कर काटती रहती है, क्योंकि इस जनता को धर्म का ज्ञान नहीं है। जीवन में कभी गीता नहीं पढ़ी, वेद नहीं पढ़े। कभी राम-कृष्ण पर भरोसा नहीं किया, तो निश्चित ही जीवन एक भटकाव ही रहेगा। मरने के बाद भी भटकाव।

यह तथाकथित भोली-भाली, लेकिन समझदार जनता हर किसी को अपना गुरु मानकर उससे दीक्षा लेकर उसका बड़ा-सा फोटो घर में लगाकर उसकी पूजा करती है। भगवान के सारे फोटो तो किसी कोने-कुचाले में वार-त्योहर पर ही साफ होते होंगे। यह जनता अपने तथाकथित गुरु के नाम या फोटोजड़ित लॉकेट गले में पहनती है। यह धर्म का अपमान और पतन ही माना जाएगा।

संभवत: ओशो रजनीश के चेलों ने सबसे पहले गले में लॉकेट पहनना शुरू किया था। अब इसकी लंबी लिस्ट है। श्रीश्री रविशंकर के चेले, आसाराम बापू के चेले, सत्य सांई बाबा के चेले के अलावा हजारों गुरु घंटाल हैं और उनके चेले तो उनसे भी महान हैं। ये चेले कथित रूप से महान गुरु से जुड़कर खुद में भी महानता का बोध पाले बैठे हैं। किसी संत का शिष्य बनना या किसी संत से दीक्षा लेना यह इन तथा‍कथित चेलों को नहीं मालूम। यह सब हिन्दू धर्म के नियमों के विरुद्ध है।

हिंदू संत कौन : हिन्दू संत बनना बहुत कठिन है, ‍क्योंकि संत संप्रदाय में दीक्षित होने के लिए कई तरह के ध्यान, तप और योग की क्रियाओं से व्यक्ति को गुजरना होता है तब ही उसे शैव या वैष्णव साधु-संत मत में प्रवेश मिलता है। इस कठिनाई, अकर्मण्यता और व्यापारवाद के चलते ही कई लोग स्वयंभू साधु और संत कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो चले हैं। इन्हीं नकली साधु्ओं के कारण हिन्दू समाज लगातार बदनाम और भ्रमित भी होता रहा है, हालांकि इनमें से कमतर ही सच्चे संत होते हैं।